▪️सूर्यकांत उपाध्याय

गोवर्धन लीला के बाद समस्त ब्रजमंडल में श्रीकृष्ण के नाम की चर्चा होने लगी। सभी ब्रजवासी उनकी जय-जयकार कर रहे थे और उनकी महिमा का गुणगान कर रहे थे। गोप-गोपियों के बीच भी कृष्ण की ही चर्चा थी।
एक स्थान पर कुछ गोप और गोपियां एकत्रित होकर चर्चा कर रहे थे। तभी मधुमंगल बोला, ‘इसमें कृष्ण की क्या विशेषता है? यह कार्य तो हम भी कर सकते हैं।’
वहां राधा रानी की सखी ललिता भी उपस्थित थीं। वह तुरंत बोलीं, ‘हां-हां, देखी है तुम्हारी योग्यता! जब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था, तब तुम सभी ने अपनी-अपनी लाठियां पर्वत के नीचे लगा दी थीं और कान्हा से हाथ हटाने को कहा था। कान्हा ने हाथ हटाना तो दूर, केवल थोड़ी-सी अंगुली टेढ़ी की और तुम सबकी लाठियां चटाचट टूट गईं। तब तुम सब मिलकर बोले थे- कान्हा, तुम ही संभालो!’
मधुमंगल बोला, ‘मान लिया कि कान्हा ने ही संभाला, लेकिन हमने प्रयास तो किया। तुमने क्या किया?’
ललिता मुस्कुराकर बोलीं, ‘हमने कुछ नहीं किया, लेकिन हमारी सखी राधा रानी ने तो किया। पर्वत तो राधा रानी ने ही उठाया था, कृष्ण का तो बस नाम हो गया!’
सभी गोप हंसने लगे। बोले, ‘पर्वत कृष्ण ने उठाया, सात दिन तक एक स्थान पर खड़े रहे, न भूख की चिंता, न प्यास की और न थकान की। सब कुछ कृष्ण ने किया और बीच में राधा रानी आ गईं!’
ललिता बोलीं, ‘तुमने ध्यान ही नहीं दिया कि कान्हा ने पर्वत किस हाथ से उठाया था।’
मधुमंगल बोला, ‘बाएं हाथ से।’
ललिता ने कहा, ‘बस, यही तो प्रमाण है! पुरुष का दायां भाग स्वयं का और बायां भाग शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कान्हा ने श्रीराधा का स्मरण किया और उनकी शक्ति से पर्वत धारण किया।’
इस तर्क का किसी के पास उत्तर नहीं था। ललिता ‘राधे-राधे’ गुनगुनाती वहां से चली गईं।
भक्त परंपरा में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण की आद्यशक्ति माना गया है। इसी भाव से कहा जाता है कि जहां राधा रानी का स्मरण होता है, वहां श्रीकृष्ण स्वयं चले आते हैं। इसलिए भक्त कृष्ण से पहले राधा का नाम लेते हैं।
