■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार श्री सेवाकुञ्ज में महारास का आयोजन था। उस दिन किसी कारणवश श्री राधारानी को रासमण्डल में आने में विलम्ब हो गया। इधर श्रीश्यामसुन्दर उनके विरह में व्याकुल हो उठे। प्रतीक्षा करते-करते वे अश्रुपूर्ण हो गए। जब श्री राधारानी अंततः रासमण्डल में पधारीं, तब श्यामसुन्दर मान धारण करके बैठ गए।
राधारानी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘ललिते! इन महाराज को क्या हुआ? ये मुँह फुलाकर क्यों बैठे हैं?’ तब ललिताजी ने उन्हें सारी बात बता दी।
राधारानी स्नेहपूर्वक श्यामसुन्दर के समीप गईं और उनके चिबुक पर अपना हाथ रखा। जैसे ही उनका स्पर्श हुआ, श्यामसुन्दर के चिबुक पर दाल-भात के कुछ कण लग गए। यह देखकर वे और भी मान करने लगे। बोले, ‘एक तो तुम इतनी देर से आईं और अब हमारे मुख पर दाल-भात लगाकर सखियों के बीच हमारा परिहास करवा रही हो!’
राधारानी मंद-मंद मुस्कुराईं और बोलीं, ‘ललिते! एक बात बताओ। ये जितने भी बाबा, संत और भजनानंदी जन अपना घर-बार छोड़कर ब्रज की रज में भजन करने आते हैं, इन्हें यहाँ बुलाने वाला कौन है?’
ललिताजी ने उत्तर दिया, ‘आपके यही श्यामसुन्दर।’
तब राधारानी बोलीं, ‘क्या इनका यह कर्तव्य नहीं कि जो इनके नाम का आश्रय लेकर वृन्दावन आए हैं, उनकी सुध भी लें? आज वृन्दावन में इतनी घनघोर वर्षा हुई कि दस महात्मा मधुकरी के लिए भी बाहर न जा सके। वे भूखे ही सोने का विचार कर रहे थे और कह रहे थे – जैसे ठाकुरजी की इच्छा। उसी समय मैं वहाँ से रासमण्डल के लिए जा रही थी। उन्हें देखकर मुझसे रहा न गया। मैंने शीघ्रता से उनके लिए दाल-भात बनाया, अपने हाथों से परोसा और कहा – बाबा, मेरी मैया ने मुझे आपकी सेवा के लिए भेजा है। इसी सेवा में विलम्ब हो गया और जल्दी में मैं अपने हाथ भी न धो सकी।’
यह सुनते ही श्यामसुन्दर की आँखें भर आईं। वे राधारानी के चरणों में झुककर बोले, ‘राधे! वैराग्य उत्पन्न करके जीवों से घर-बार छुड़वाना तो मेरा कार्य है, किन्तु उन्हें प्रेम देना, दुलारना, सम्मान देना, उनकी रक्षा करना और उन्हें अपनी गोद में लेकर यह विश्वास दिलाना कि “मैं हूँ न”, यह सब केवल आप ही जानती हैं। यही आपकी अनन्त कृपा है।’यह संस्करण मूल भाव, भक्ति-रस और कथा की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए भाषा और व्याकरण की दृष्टि से परिष्कृत किया गया है।
