
▪️नई दिल्ली
आज भले ही ‘जंतर-मंतर’ का नाम धरना-प्रदर्शनों के कारण अधिक चर्चा में रहता हो, लेकिन इसकी वास्तविक पहचान भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत से जुड़ी है। लगभग 300 वर्ष पहले निर्मित ये वेधशालाएं खगोल विज्ञान, गणित और वास्तुकला का अद्भुत संगम हैं, जिनका उद्देश्य ग्रहों, नक्षत्रों और समय की सटीक गणना करना था।
इन वेधशालाओं का निर्माण 18वीं शताब्दी में आमेर और जयपुर के शासक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। उस समय प्रचलित खगोलीय गणनाओं में त्रुटियां थीं, जिससे पंचांग, ग्रहण, त्योहारों और शुभ मुहूर्तों की तिथियों में अंतर आ जाता था। इसे दूर करने के लिए उन्होंने छोटे उपकरणों के बजाय विशाल स्थायी यंत्रों का निर्माण कराया, जिनकी सहायता से सूर्य, चंद्रमा और अन्य आकाशीय पिंडों की स्थिति का सटीक अध्ययन किया जा सकता था।
सवाई जय सिंह ने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में कुल पांच जंतर-मंतर बनवाए। इनमें जयपुर का जंतर-मंतर सबसे विशाल और सबसे बेहतर संरक्षित है। यहां स्थित ‘सम्राट यंत्र’ दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्य घड़ियों में गिना जाता है। इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है।
आधुनिक युग में भले ही उपग्रह, दूरबीन और डिजिटल तकनीक ने खगोलीय अध्ययन को नई दिशा दे दी हो, लेकिन जंतर-मंतर आज भी भारत की वैज्ञानिक सोच, गणितीय कौशल और स्थापत्य कला का जीवंत प्रमाण है। यही कारण है कि ये वेधशालाएं केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि देश की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत के प्रतीक मानी जाती हैं।
