▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक मेंढक तालाब के किनारे से गुजर रहा था। तभी उसे किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। उसने रुककर देखा तो एक दूसरा मेंढक उदास और निराश बैठा था।
‘क्या बात है मित्र? इतने दुखी क्यों हो?’ पहले मेंढक ने पूछा।
दूसरे ने गहरी साँस लेते हुए कहा, ‘देखो न, यह तालाब कितना गंदा हो गया है। पहले यहाँ कीड़े-मकौड़ों की भरमार रहती थी, लेकिन अब मुश्किल से पेट भरने लायक भोजन मिलता है। लगता है, एक दिन भूख से ही मर जाऊँगा।’
पहला मेंढक मुस्कराया और बोला, ‘पास ही एक दूसरा तालाब है। वह साफ़-सुथरा है, वहाँ भोजन की कोई कमी नहीं। आओ, मेरे साथ चलो।’
दूसरा मेंढक बोला, ‘काश! कीड़े यहीं आ जाते, तो मुझे कहीं जाने की ज़रूरत ही न पड़ती।’
पहले ने समझाया, ‘लेकिन वहाँ चलोगे, तभी तो बेहतर जीवन मिलेगा।’
दूसरा फिर बोला, ‘काश! मेरी जीभ इतनी लंबी होती कि मैं यहीं बैठे-बैठे दूर-दूर तक के कीड़े पकड़ लेता और मुझे हिलना भी न पड़ता।’
पहले मेंढक ने धैर्यपूर्वक कहा, ‘जो कभी संभव ही नहीं है, उसके बारे में सोचकर दुखी होने से क्या लाभ? समझदारी इसी में है कि जो बदल सकता है, उसे बदलने का साहस किया जाए। चलो, मेरे साथ चलो।’
इसी बीच एक बड़ा-सा बगुला तालाब के किनारे आकर बैठ गया।
दूसरा मेंढक घबराकर बोला, ‘लो, अब तो यह बगुला भी आ गया। मेरी मौत तय है।’
पहला मेंढक बोला, ‘डरो मत। अभी भी समय है। मेरे साथ चलो, उस तालाब में कोई बगुला नहीं आता।’
लेकिन दूसरा मेंढक वहीं बैठा रहा। वह सोचता रहा, शिकायत करता रहा और किस्मत को कोसता रहा।
कुछ ही क्षणों बाद बगुले ने झपट्टा मारा और उसे अपनी चोंच में दबोच लिया। अंतिम साँस लेते समय भी वह यही सोच रहा था—’काश! मेरी किस्मत भी दूसरों जैसी होती।’
- शिक्षा : जीवन में अधिकांश लोग इसी दूसरे मेंढक की तरह होते हैं। वे अपनी परिस्थितियों, नौकरी, व्यापार, परिवार, समाज और भाग्य को तो लगातार कोसते रहते हैं, लेकिन उन्हें बदलने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाते।
