▪️सूर्यकांत उपाध्याय

दोपहर की तपती धूप में एक बच्चा मंदिर के सामने गर्म सड़क पर नंगे पैर फूल बेच रहा था। लोग उससे फूलों के दाम पर मोलभाव कर रहे थे। तभी एक सज्जन की नजर उसके जलते हुए पैरों पर पड़ी। बच्चे की हालत देखकर उनका मन द्रवित हो उठा। वे तुरंत पास की दुकान पर गए और उसके लिए जूते खरीद लाए।
जूते बच्चे को देते हुए उन्होंने कहा, “बेटा, इन्हें पहन लो।”
बच्चे ने झटपट जूते पहने। उसके चेहरे पर खुशी छा गई। वह उस सज्जन का हाथ पकड़कर बोला, “आप भगवान हैं!”
सज्जन ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं बेटा, मैं भगवान नहीं हूं।”
बच्चा तुरंत बोला, “तो फिर आप भगवान के दोस्त जरूर होंगे!”
यह सुनकर सज्जन हैरान रह गए। बच्चे ने मासूमियत से कहा, “मैंने कल रात ही भगवानजी से प्रार्थना की थी कि मेरे पैर बहुत जलते हैं। भगवानजी, मुझे जूते दिलवा दीजिए।”
बच्चे की बात सुनकर सज्जन की आंखें भर आईं। वे मुस्कुराते हुए वहां से चले गए, लेकिन उनके मन में एक अनमोल विचार जन्म ले चुका था-भगवान का दोस्त बनने के लिए किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद की मदद करने वाले संवेदनशील हृदय की आवश्यकता होती है।
- शिक्षा – किसी जरूरतमंद की निस्वार्थ भाव से मदद करके हम भी भगवान के दोस्त बन सकते हैं। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना और उसके दुख को कम करना ही सच्ची मानवता है।
