■ सूर्यकांत उपाध्याय

कभी-कभी माता-पिता को संतान से धन नहीं, केवल उसका समय और स्नेह चाहिए होता है। यह भावनात्मक कहानी उसी सच्चाई को उजागर करती है कि रिश्तों की असली कीमत पैसे से नहीं, बल्कि अपनापन और साथ से तय होती है।
एक दिन एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अदालत पहुंचा। वह अपने ही बेटे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना चाहता था। जज ने आश्चर्य से पूछा, “आपको अपने बेटे से क्या शिकायत है?”
बूढ़े पिता ने शांत स्वर में कहा, “मैं अपने बेटे से उसकी हैसियत के अनुसार हर महीने कुछ खर्च लेना चाहता हूं।”
जज ने कहा, “यह तो आपका अधिकार है। इसमें अदालत की क्या जरूरत?”
पिता बोले, “मेरे पास पैसों की कोई कमी नहीं है, फिर भी मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा मुझे हर महीने कुछ पैसे दे, चाहे वह कम ही क्यों न हों।”
जज को बात समझ नहीं आई। उन्होंने बेटे को अदालत में बुलाया। बेटा आया तो उसने भी हैरानी से कहा, “मेरे पिता तो बहुत अमीर हैं, उन्हें मुझसे पैसों की क्या जरूरत?”
तब पिता ने जज से कहा, “आप इसे आदेश दीजिए कि यह मुझे हर महीने 100 रुपये अपने हाथों से देगा और इसमें कभी देरी नहीं करेगा।”
अदालत ने यही आदेश दे दिया।
मुकदमा खत्म होने के बाद जज ने बुज़ुर्ग को अलग बुलाकर पूछा, “जब आपको पैसों की जरूरत नहीं, तो आपने यह केस क्यों किया?”
बूढ़े पिता की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा, “जज साहब, मैं अपने बेटे का चेहरा देखने के लिए तरस गया था। वह अपने काम में इतना व्यस्त रहता है कि वर्षों से हम मिले भी नहीं। इसलिए मैंने यह उपाय किया, ताकि हर महीने उससे मुलाकात हो सके।”
यह सुनकर जज की आंखें भी नम हो गईं।
