▪️सूर्यकांत उपाध्याय

गोकुल के पास एक गाँव में आनंदीबाई नाम की महिला रहती थीं। वे अत्यंत कुरूप थीं। विवाह के बाद जब उनके पति ने उन्हें देखा, तो उन्हें स्वीकार नहीं किया और दूसरा विवाह कर लिया। इस गहरे अपमान के बाद भी आनंदीबाई ने किसी से शिकायत नहीं की। उन्होंने निश्चय किया कि अब उनका जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति को समर्पित रहेगा।
गोकुल में एक छोटे से घर में उन्होंने ठाकुरजी का मंदिर बनाया। सुबह-शाम वे श्रीकृष्ण की मूर्ति से बातें करतीं, कभी रूठतीं तो कभी उन्हें मनातीं। साधु-संतों की सेवा और सत्संग ही उनका जीवन बन गया।
एक दिन गोकुल में श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन हुआ। कुब्जा के पात्र के लिए किसी की तलाश थी। संयोग से आनंदीबाई के पूर्व पति ने उनकी कुरूपता का उपहास उड़ाते हुए उनका नाम सुझा दिया। आयोजकों ने भी उन्हें यह भूमिका दे दी। आनंदीबाई ने इसे अपमान नहीं बल्कि श्रीकृष्ण की सेवा का अवसर मानकर सहर्ष स्वीकार कर लिया।
वे मन ही मन सोचती रहीं, ‘मेरा कन्हैया आएगा… मेरे चरणों पर अपना चरण रखेगा और मेरी ठोड़ी उठाकर मुझे अपने दर्शन देगा।’
लीला के मंचन में जब बालक श्रीकृष्ण ने कुब्जा के प्रसंग के अनुसार उनके चरण पर चरण रखा और ठोड़ी उठाई, तो उपस्थित लोगों ने देखा कि आनंदीबाई का चेहरा बदल चुका था। उनकी कुरूपता मानो विलीन हो गई थी। लोग इसे श्रीकृष्ण की कृपा और भक्ति की महिमा मानकर आश्चर्यचकित रह गए।
इसके बाद आनंदीबाई और भी अधिक भक्ति में लीन हो गईं। वे अपने पूर्व पति के प्रति भी कृतज्ञ रहीं। उनका कहना था, ‘यदि उन्होंने मुझे न छोड़ा होता, तो शायद मैं श्रीकृष्ण की शरण में कभी न आती।’
- शिक्षा: जीवन की हर परिस्थिति को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने और कृतज्ञ रहने से विपरीत समय भी आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन सकता है।
