▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक व्यापारी, जिसका व्यापार डूब गया था, अपनी जिंदगी से बुरी तरह थक-हार चुका था। परेशान होकर वह जंगल में गया और बहुत देर तक अकेला बैठा रहा। कुछ सोचकर वह भगवान को संबोधित करते हुए बोला, ‘भगवान, मैं हार चुका हूं। मुझे कोई एक वजह बताइए कि मैं जीवित रहूं। मेरा सब कुछ खत्म हो गया है। मेरी मदद करिए।’
भगवान ने जवाब दिया, ‘तुम जंगल में इस घास और बांस के पौधे को देखो। जब मैंने घास और बांस के बीज लगाए, तो दोनों की अच्छे से देखभाल की। दोनों को एक जैसा पानी और रोशनी दी। घास जल्दी बड़ी होने लगी और उसने धरती को हरा-भरा कर दिया, लेकिन बांस का बीज नहीं बढ़ा। फिर भी मैंने बांस के लिए हिम्मत नहीं हारी।
दूसरे साल घास और घनी हो गई, लेकिन बांस का बीज नहीं उगा। मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।
तीसरे साल भी बांस के बीज में कोई अंकुर नहीं निकला। मित्र! मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।
चौथे साल भी बांस के बीज में कोई अंकुर नहीं आया। मैं नाराज नहीं हुआ। पांच साल बाद उस बांस के बीज से एक छोटा-सा पौधा अंकुरित हुआ, जो घास की तुलना में बहुत छोटा और कमजोर था। लेकिन केवल छह महीने बाद यह छोटा-सा पौधा 100 फीट लंबा हो गया।
मैंने इस बांस की जड़ को विकसित करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच वर्षों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गई कि वह 100 फीट ऊंचे बांस को संभाल सके।
जब भी हमारे जीवन में संघर्ष करना पड़े, तो समझिए कि हमारी जड़ मजबूत हो रही है। हमारा संघर्ष हमें मजबूत बना रहा है, ताकि हम आने वाले कल को सबसे बेहतर बना सकें।
मैंने बांस के संदर्भ में हार नहीं मानी। मैं तुम्हारे विषय में भी हार नहीं मानूंगा। किसी दूसरे से अपनी तुलना मत करो। घास और बांस, दोनों के बड़े होने का समय अलग-अलग है और दोनों का उद्देश्य भी अलग-अलग है।
- शिक्षा: हमें अपनी जिंदगी में संघर्ष से नहीं घबराना चाहिए। यही संघर्ष हमारी सफलता की जड़ों को मजबूत करता है।
