▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार जब भगवान श्रीकृष्ण लीला कर रहे थे, तब ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि सभी देवता ठाकुर जी के निकट आए। उन्होंने देखा कि ठाकुर जी अपने पीछे कुछ छिपा रहे हैं।
तब देवता बोले-
‘प्रभु, आप क्या छिपा रहे हैं?’
भगवान चुपचाप खड़े रहे। उनके हाथ में एक पात्र था, जिसे उन्होंने पीछे छिपा रखा था। देवताओं ने फिर पूछा—’प्रभु, आप क्या छिपा रहे हैं?’
भगवान धीरे से बोले—’देखो, आप किसी को बताना नहीं। यह जो पात्र है न, इसमें बड़ी मुश्किल से आज मैं कहीं से छाछ लेकर आया हूं!’
देता बोले—’फिर प्रभु, इसे छिपा क्यों रहे हैं? क्या यह बहुत कीमती है?’
भगवान बोले-‘अब इसकी कीमत मैं क्या बताऊं?’
तब देवता बोले-‘प्रभु, आप जो अनंत कोटि ब्रह्मांडों के नायक हैं, आप इस छाछ को छिपा रहे हैं, तो यह तो अनमोल होगी। प्यारे, एक घूंट हमें भी मिल जाए। आप कृपा कर दें, ताकि हम भी एक घूंट पी सकें।’
भगवान बोले-‘नहीं-नहीं देवताओं! यह छाछ तुम्हारे सौभाग्य में नहीं है। तुम स्वर्ग का अमृत पी सकते हो, पर ब्रजवासियों की छाछ तो मैं ही पीऊंगा। तुम जाओ और स्वर्ग का अमृत पियो, लेकिन यह छाछ मैं तुम्हें नहीं दे सकता।’
देवता बोले-‘प्रभु, ऐसी कौन-सी अनमोल बात है इस छाछ में, जो हम इसे नहीं पी सकते? आप कह रहे हैं कि हम अमृत पिएं, तो क्या यह छाछ अमृत से भी बढ़कर है? अरे, छाछ तो छाछ है, इसमें क्या बड़ी बात है?’
इतना सुनते ही ठाकुर जी की आंखों में आंसू भर आए। वे बोले-‘देवताओं, तुम्हें नहीं पता, इस छाछ को पाने के लिए मुझे गोपियों के सामने नृत्य करना पड़ा है। जब मैं नाचा, तब मुझे यह छाछ मिली है-
‘ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भर छाछ पर नाच नचावें।’
तो कुछ तो बात होगी ही न गोपियों के प्रेमवश बनाए इस छाछ में, जिसे पाने के लिए स्वयं ठाकुर जी को नाचना पड़ा।
वस्तुतः भक्त के निःस्वार्थ हृदय की गहराइयों से निःसृत भजन ही भगवान का भोजन है। परमात्मा इसी प्रेमवश भोग लगाया करते हैं।
हरि के सब आधीन पै, हरि प्रेम आधीन।
याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन।।
