▪️सूर्यकांत उपाध्याय

जानकी को नाश्ता करते समय ही घुटनों में हल्का दर्द महसूस होने लगा था। दर्द जब असहनीय हो गया तो उसने बहू श्वेता को आवाज दी।
‘बहू… जरा यहां आना।’
‘जी मम्मी जी, आपने बुलाया?’
‘मेरे घुटने बहुत दर्द कर रहे हैं। जरा दराज से मूव निकालकर मालिश कर दो और गरम पानी की थैली से सिंकाई भी कर दो।’
श्वेता ने कहा, ‘मम्मी जी, मुझे मूव की गंध से उल्टी आती है। मैं मालिश तो नहीं कर पाऊंगी। गरम पानी की थैली ला देती हूं, उससे आप खुद सिंकाई कर लेना।’
बहू का जवाब सुनकर जानकी कुछ नहीं बोली। उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उसे अपने पुराने कर्म याद आने लगे। उसने भी कभी अपनी सास की इज्जत नहीं की थी और उन्हें अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा था। उसे अपने दिवंगत पति की बात याद आई—’कर्म का फल यहीं मिलता है, जानकी।’
उसी समय श्वेता की मां घर आईं। श्वेता ने उन्हें अलग कमरे में ले जाकर सारी बात बताई।
मां ने कहा, ‘श्वेता, यह गलत है। बीमार और लाचार इंसान से इस तरह बात नहीं करनी चाहिए।’
श्वेता बोली, ‘मम्मा, आप नहीं जानतीं, इन्होंने अपनी सास को बहुत सताया था। मुझे सब पता चला है।’
मां ने समझाया, ‘तो क्या तुम भी वही करोगी? उन्होंने अपनी सास को सताया और तुम अपनी सास को सताओगी, तो कल तुम्हारी बहू तुम्हारे साथ यही करेगी। बच्चे घर में जो देखते हैं, वही सीखते हैं।’
श्वेता की आंखें खुल गईं। उसने कहा, ‘सॉरी मम्मा, मुझसे गलती हो गई। अब मैं उनका ध्यान अपनी मां की तरह रखूंगी।’
मां मुस्कुराईं और बोलीं, ‘जहां जागे, वहीं सवेरा। किसी को दंड देने का अधिकार हमें नहीं है। ऊपर बैठा भगवान सबका न्याय करता है।’
श्वेता तुरंत जानकी के पास गई और उनके घुटनों में मूव लगाकर मालिश करने लगी। जानकी की आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार उनमें दर्द से ज्यादा संतोष था।
