▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

मुंबई महानगर के कल्याण के पास विट्ठलवाड़ी इलाके में पले-बढ़े अक्षय दया मोहिते आज की पीढ़ी के एक नए, होनहार और उतने ही बोल्ड लेखक हैं। उनके लेखन की मुख्य विशेषता अलग तरह की भाषा, शैली और कहानी कहने का तरीका है। यशवंतराव चव्हाण सेंटर की शरद पवार इंस्पायर फेलोशिप प्राप्त उनके उपन्यास ‘बिल्लाबाँग’ के जरिए हमें झोपड़पट्टी इलाके आनंद नगर की संघर्ष और भागदौड़ भरी दुनिया देखने को मिलती है, जिसमें गरीबी, अभाव, दरिद्रता, व्यसन, लड़ाई-झगड़े, विवाद, जातीय दंश, छुआछूत आदि का बोलबाला है। इसके साथ ही एक कॉरपोरेट कंपनी ‘रेशीमगाठी मेट्रोमोनियल’ के कॉल सेंटर की चमक-दमक वाली दुनिया का अनोखा मेल भी देखने को मिलता है। लेखक ने मैट्रिमोनियल कंपनी की वर्चुअल दुनिया की मृगतृष्णा, उसमें गुमनाम लोगों के दिल को छू लेने वाले सुख-दुख और उनके जिंदा रहने के संघर्ष को बड़ी मजबूती से पेश किया है।
‘बिल्लाबाँग’ तीन मामलों में बेहद समृद्ध कृति है। पहली बात यह है कि मुंबई पर तो खूब लिखा गया है और प्रचुर मात्रा में मुंबई के जनजीवन पर आधारित कहानियां व उपन्यास लिखे गए हैं, लेकिन कल्याण-विट्ठलवाड़ी जैसे इलाके की झोपड़पट्टी को केंद्र में रखकर मराठी में यह पहला उपन्यास लिखा गया है। दूसरी बात यह है कि आनंद नगर की जो बोलचाल की भाषा है, वह मराठी की भाषाई समृद्धि को बढ़ाती है। यह ‘स्लैंग’ नहीं, बल्कि बातचीत का एक जीवंत तरीका है। यह भाषा बहुत सीधी, आज के जमाने की, रोजमर्रा की जिंदगी वाली और सिनेमाई है। इसके अलावा इसमें कॉल सेंटर के संदर्भ में महाराष्ट्र की तकरीबन आठ-नौ मराठी बोलियों में भी संवाद हैं। तीसरा तथ्य यह है कि इस उपन्यास में तृतीयपंथियों की दुनिया पर भी प्रकाश डाला गया है।
‘बिल्लाबाँग’ के पात्रों में झवाडा चाचा, चोमू, मीना पोटे, चार्ली, डब्ल्यू, हंसा, सोमनाथ, डब्ल्यू का पिता, मुकेश, नंदा और लवंगी प्रमुख हैं। उपन्यास का नायक डैनी कंडार जेन-जी पीढ़ी का बुद्धिमान युवक है। अनाथ डैनी अपने मामा के यहां छोटा से बड़ा होता है। डैनी आनंद नगर झोपड़पट्टी में रहता है। उसके सामने फ्लाईओवर है, तो बगल में रेलवे लाइन और किलेबंदी जैसी सुरक्षा वाले आलीशान टावर हैं। बुद्धिमान डैनी रोजाना झोपड़पट्टी के संघर्ष से दो-चार होता है, जिसमें अभाव है, छुआछूत का दंश है, लड़ाई-झगड़ा और विवाद है, धर्मांधता का जहर है तथा कई तरह के व्यसन हैं। यहां कभी-कभार आत्महत्या की घटनाएं भी होती हैं। डैनी दरिद्रता के दलदल से बाहर आने के लिए संघर्ष करता है और अपनी जाति छिपाकर मैट्रिमोनियल कंपनी के कॉल सेंटर में नौकरी पा जाता है।
वह बाहर की चमकती मॉल संस्कृति और ग्लैमरस नौकरी में झोपड़पट्टी की चीजों की कमी को ढूंढने की कोशिश करता है। लेकिन शादी का लालच देने वाली और झूठे सपनों का पैकेज बेचने वाली इस नौकरी में भी वह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता। रेशीमगाठी कंपनी विवाह करवाने का लालच देकर लोगों का आर्थिक शोषण करती है और उन्हें अपने जाल में फंसाकर बेवकूफ बनाती है।
बेफिक्री से जीने वाले डैनी को इस व्यवस्था का झूठा, बेरहम और गलत तौर-तरीका पसंद नहीं आता। डैनी बाबा गैंग का हिस्सा बन जाता है और नशे की दुनिया में इस तरह धंसता चला जाता है कि उससे बाहर नहीं निकल पाता। यहां यह विसंगति देखने को मिलती है कि बाबा गैंग नामक यह समूह बच्चों को शैक्षणिक सहायता देने के साथ ही उन्हें नशे की दुनिया छोड़कर सही जीवन जीने के लिए भी प्रोत्साहित करता है।
डैनी और तृतीयपंथी लवंगी के बीच का रिश्ता और संवाद पाठकों को एक नया दर्शन देते हैं। लवंगी का प्यार डैनी को अच्छा लगता है, लेकिन वह भी भाग जाता है और एक बार फिर डैनी अकेला रह जाता है।
व्यवस्था से प्रताड़ित डैनी और उसके आसपास का माहौल एकदम यथार्थ है। नशे की लत में डूबे लोगों का वजूद, इंसान के तौर पर उनकी ऊर्जा और व्यवस्था के बनाए नियमों से बंधे इन लोगों को कौन समझ सकता है? असल में, उन्हें समझने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद ही नहीं है। रेलवे की चहल-पहल इन लोगों की जिंदगी को जीवंत बनाए रखती है।
उपन्यास में कई तरह के नशे, लड़ाई-झगड़े, हत्या, आत्महत्या, जिंदगी के विभिन्न दुख, अभाव और उनसे गुजरने की जद्दोजहद को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
कुल मिलाकर, ललित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 490 पृष्ठों का ‘बिल्लाबाँग’ एक ऐसा उपन्यास है, जो पुरानी परंपराओं को तोड़कर आज के समाज की असलियत को एक अलग और प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत करता है। उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे कोई अच्छी गुणवत्ता वाली ‘वेब सीरीज’ देख रहे हों।
अक्षय दया मोहिते ने आज की सेमी-अर्बन जिंदगी, बहुजन और अभिजन दोनों की दुनिया तथा वहां के लोगों को वास्तविक रूप में चित्रित किया है।
