▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक गांव में कुछ ग्रामीण मिलकर एक सांप को मार रहे थे। तभी उसी रास्ते से संत एकनाथ गुजर रहे थे। भीड़ देखकर वे भी वहां पहुंचे और बोले, ‘भाइयों, इस प्राणी को क्यों मार रहे हो? कर्मवश सांप होने से क्या यह भी एक जीव नहीं है?’
भीड़ में खड़े एक युवक ने कहा, ‘अगर यह भी जीव है तो फिर लोगों को काटता क्यों है?’
संत एकनाथ ने समझाते हुए कहा, ‘तुम लोग सांप को बेवजह मारोगे तो वह भी अपनी रक्षा के लिए तुम्हें काटेगा। यदि तुम उसे नहीं मारोगे, तो वह तुम्हें क्यों काटेगा?’
ग्रामीण संत एकनाथ का बहुत सम्मान करते थे। उनकी बात सुनकर उन्होंने सांप को छोड़ दिया और अपने-अपने घर चले गए।
कुछ दिनों बाद शाम के समय संत एकनाथ स्नान करने के लिए घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें वही सांप फन फैलाए दिखाई दिया। एकनाथ ने उसे रास्ते से हटाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। अंततः संत दूसरे घाट पर स्नान करने चले गए।
रात बीतने के बाद जब वे उसी रास्ते से लौटे तो देखा कि बारिश के कारण वहां एक बड़ा गड्ढा बन गया था। यदि सांप ने उन्हें उस रास्ते से आगे जाने से नहीं रोका होता, तो वे गड्ढे में गिर सकते थे और गंभीर संकट में पड़ सकते थे।
संत एकनाथ समझ गए कि जिस प्राणी की उन्होंने रक्षा की थी, उसी ने समय आने पर उनकी रक्षा करके अपने उपकार का फल लौटा दिया।
- शिक्षा: दया और परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाते। हम किसी के लिए भलाई करते हैं तो किसी न किसी रूप में उसका अच्छा फल हमें अवश्य मिलता है।
