▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक गांव में एक साधु रहते थे। वे भगवान की भक्ति में लीन रहते और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या करते थे। उन्हें भगवान पर अटूट विश्वास था। गांव वाले भी उनका बहुत सम्मान करते थे।
एक दिन गांव में भीषण बाढ़ आ गई। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देने लगा। लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर जाने लगे। ग्रामीणों ने साधु को भी बाढ़ की सूचना दी और सुरक्षित स्थान पर चलने के लिए कहा। साधु बोले, ‘तुम लोग अपनी जान बचाओ, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा।’
कुछ समय बाद पानी साधु की कमर तक पहुंच गया। तभी राहत दल की एक नाव वहां पहुंची। दल के सदस्यों ने साधु से नाव पर सवार होकर सुरक्षित स्थान पर चलने का आग्रह किया। साधु ने फिर कहा, ‘मुझे आपकी मदद की आवश्यकता नहीं है। मेरा भगवान मुझे बचाएगा।’ राहत दल आगे बढ़ गया।
अगले दिन बाढ़ और भी प्रचंड हो गई। साधु जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ गए और वहीं बैठकर भगवान का स्मरण करने लगे। तभी एक हेलीकॉप्टर वहां पहुंचा। बचाव दल ने रस्सी नीचे लटकाकर साधु से उसे पकड़ने को कहा, लेकिन साधु ने फिर वही उत्तर दिया, ‘मुझे मेरा भगवान बचाएगा।’
कुछ ही देर बाद बाढ़ की तेज धारा में पेड़ बह गया और साधु की मृत्यु हो गई।
स्वर्ग पहुंचकर साधु ने भगवान से पूछा, ‘प्रभु, मैंने पूरी श्रद्धा से आपकी आराधना की, फिर जब मैं डूब रहा था, तब आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?’
भगवान ने कहा, ‘हे साधु, मैं तुम्हें बचाने एक नहीं, तीन बार आया था। पहली बार ग्रामीणों के रूप में, दूसरी बार नाव लेकर राहत दल के रूप में और तीसरी बार हेलीकॉप्टर से बचाव दल के रूप में। लेकिन तुमने मेरे भेजे अवसरों को पहचाना ही नहीं।’
साधु को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी।
- सीख: ईश्वर हमेशा चमत्कार के रूप में नहीं आते। कई बार वे दूसरों की मदद, अवसर और सही समय पर मिले संकेतों के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं।
