
▪️नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर किए गए एक बड़े सर्वे में चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों की आत्महत्या के मामलों की जांच और रोकथाम के लिए गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सर्वे में करीब 2.43 लाख छात्र शामिल हुए। इनमें लगभग 15 प्रतिशत ने बताया कि पिछले छह महीनों में वे बेहद तनाव या परेशानी के दौर से गुजरे। करीब 9 प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
यह सर्वे टास्क फोर्स की अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसमें छात्रों की मानसिक सेहत सुधारने और आत्महत्या की घटनाएं रोकने के उपाय सुझाए जाएंगे। रिपोर्ट 31 अक्टूबर तक सौंपे जाने की उम्मीद है।
सर्वे में 34 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि परिसर में रहते हुए उन्हें कभी न कभी बाहरी जैसा महसूस हुआ। करीब 67 प्रतिशत प्रतिभागी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे। टास्क फोर्स की अंतरिम रिपोर्ट में सामाजिक व जातिगत भेदभाव, लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न और ‘मोरल पुलिसिंग’ जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया था।
केवल 56 प्रतिशत छात्रों को भरोसा था कि उनका संस्थान गंभीर मामलों का निष्पक्ष समाधान करेगा, जबकि 32 प्रतिशत ने बताया कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा नहीं है। पढ़ाई, करियर और नौकरी की चिंता भी बड़ी परेशानी बनकर सामने आई।
आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मुंबई में छात्रों की मौत के बाद कई संस्थानों ने हॉस्टल में एंटी-सुसाइड पंखे लगाने जैसे कदम उठाए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल ऐसे उपाय पर्याप्त नहीं हैं। छात्रों को समय पर काउंसलिंग, भावनात्मक सहयोग और सुरक्षित माहौल भी जरूरी है, जहां वे अपनी परेशानी खुलकर साझा कर सकें।
