▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक रात घना अंधेरा था। एक काफिला रेगिस्तानी सराय में आकर ठहरा। काफिले के पास सौ ऊंट थे। निन्यानबे ऊंटों को रस्सियों से बांध दिया गया, लेकिन सौवां ऊंट अनबंधा रह गया। एक खूंटी और रस्सी कहीं खो गई थी।
आधी रात को उन्होंने सराय के बूढ़े मालिक को जगाया और समस्या बताई। बूढ़े ने कहा, ‘घबराओ मत। मेरे पास रस्सी और खूंटी तो नहीं है, लेकिन तुम ऐसा करो जैसे खूंटी गाड़ रहे हो और रस्सी बांध रहे हो। ऊंट को विश्वास हो जाएगा कि वह बंधा हुआ है।’
मजबूरी में उन्होंने वैसा ही किया। काल्पनिक खूंटी गाड़ी, रस्सी बांधने का अभिनय किया और ऊंट से बैठ जाने को कहा। आश्चर्यजनक रूप से ऊंट बैठ गया और रातभर वहीं रहा।
सुबह काफिला चलने की तैयारी करने लगा। निन्यानबे ऊंटों की रस्सियां खोली गईं और वे उठकर खड़े हो गए, लेकिन सौवां ऊंट उठने को तैयार नहीं था। उन्होंने उसे खूब धक्का दिया, फिर बूढ़े के पास पहुंचे।
बूढ़ा मुस्कुराया और बोला, ‘पहले उसकी रस्सी खोलो और खूंटी उखाड़ो।’
उन्होंने कहा, ‘लेकिन वहां रस्सी और खूंटी है ही नहीं!’
बूढ़े ने कहा, ‘जिस तरह रात में बांधी थी, उसी तरह अब खोलने का अभिनय करो।’
उन्होंने वैसा ही किया और ऊंट तुरंत उठ खड़ा हुआ।
बूढ़े ने कहा, ‘यह ऊंटों की जानकारी नहीं, इंसानों की समझ का अनुभव है। मनुष्य भी ऐसी ही अदृश्य रस्सियों और काल्पनिक खूंटियों से बंधा रहता है। कई बार बंधन वास्तव में होते नहीं, लेकिन हम उन्हें सच मानकर जीवनभर वहीं खड़े रहते हैं।’
- शिक्षा: जीवन में आगे बढ़ने के लिए कई बार बाहरी बंधन नहीं बल्कि अपने मन के डर, भ्रम और धारणाओं को छोड़ना जरूरी होता है।
