▪️सूर्यकांत उपाध्याय

काकभुशुण्डि जी भगवान श्रीराम के परम भक्त माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार उन्हें समय की सीमाओं से परे जाकर भूत और भविष्य की घटनाओं को देखने का वरदान प्राप्त था। कहा जाता है कि उन्होंने रामायण 16 बार और महाभारत 11 बार देखा था। वे रामकथा के महान ज्ञाता और भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त माने जाते हैं।
कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में वे एक कौवे के रूप में थे। जब भगवान शिव ने माता पार्वती को श्रीराम की कथा सुनाई, तब काकभुशुण्डि जी ने भी वह कथा सुन ली। इसके बाद उनका जन्म अयोध्या में एक शूद्र परिवार में हुआ। वे भगवान शिव के परम भक्त थे, लेकिन अहंकारवश अन्य देवताओं का उपहास करते थे। उनके इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर लोमश ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप वे पुनः कौवे के रूप में हो गए। बाद में उन्होंने इसी रूप में रहते हुए श्रीराम की अनन्य भक्ति की।
रामायण के प्रसंग में आता है कि युद्ध के दौरान मेघनाद ने भगवान श्रीराम को नागपाश में बांध दिया था। तब देवर्षि नारद के कहने पर गरुड़ जी वहां पहुंचे और नागपाश से श्रीराम को मुक्त किया। श्रीराम को नागपाश में बंधा देखकर गरुड़ जी के मन में उनके भगवान होने को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ।
अपने संदेह के समाधान के लिए गरुड़ जी पहले ब्रह्माजी और फिर भगवान शिव के पास गए। भगवान शिव ने उन्हें काकभुशुण्डि जी के पास भेजा। काकभुशुण्डि जी ने उन्हें भगवान श्रीराम के चरित्र, महिमा और भक्ति की कथा सुनाकर उनका संदेह दूर किया।
