▪️सूर्यकांत उपाध्याय

कहा जाता है कि संसार में किया गया कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। समय भले ही बीत जाए, परिस्थितियां बदल जाएं और जीवन का स्वरूप बदल जाए, लेकिन कर्म अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, कंस का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने माता-पिता वासुदेव और देवकी को कारागार से मुक्त कराने पहुंचे। वर्षों की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद पुत्र को सामने देखकर देवकी की आंखें भर आईं। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, ‘पुत्र, तुम स्वयं भगवान हो। फिर हमें कंस के कारागार में चौदह वर्षों तक प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ी?’
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, ‘मां, क्या आपको अपने पिछले जन्म की कोई स्मृति है?’
देवकी ने आश्चर्य से पूछा, ‘पिछले जन्म की?’
श्रीकृष्ण ने कहा, ‘त्रेतायुग में आप कैकेयी थीं और वासुदेव राजा दशरथ। आपने ही भगवान राम को चौदह वर्षों का वनवास दिया था।’
यह सुनकर देवकी स्तब्ध रह गईं। कुछ क्षण बाद उन्होंने पूछा, ‘यदि मैं कैकेयी थी और वासुदेव दशरथ, तो इस जन्म में कौशल्या कौन हैं?’
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘माता यशोदा।’
कथा का संदेश गहरा है। जीवन में परिस्थितियां बदल सकती हैं, जन्म बदल सकता है, संबंधों के रूप बदल सकते हैं, लेकिन कर्मों का प्रभाव बना रहता है। जो हम संसार को देते हैं, वही किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे जीवन के द्वार पर दस्तक देता है।
इसलिए जीवन में किसी के साथ अन्याय न करें, किसी का हृदय न दुखाएं और अपने सामर्थ्य के अनुसार सदैव अच्छे कर्म करें। क्योंकि कर्म का लेखा अदृश्य जरूर है, लेकिन निष्पक्ष है।
