
▪️सूर्यकांत उपाध्याय
विदेश के एक समाचार पत्र में एक दिन एक विचित्र विज्ञापन प्रकाशित हुआ-
‘एक वृद्ध दंपति चाहिए, जो हमारे साथ रह सके।’
एक वृद्ध दंपति ने विज्ञापन देखकर फोन किया। पूछा, ‘हमें काम की जरूरत है। बताइए, क्या करना होगा?’
उधर से आवाज आई, ‘हम दोनों डॉक्टर हैं। तीन महीने पहले हमारी मां का निधन हो गया। घर में सेवा-सुश्रूषा के लिए कर्मचारी हैं। हमें किसी सेवक की आवश्यकता नहीं है। हमें तो बस किसी अपने की जरूरत है।’
कुछ क्षण मौन रहने के बाद डॉक्टर ने कहा, ‘हम जब देर रात घर लौटें तो कोई पूछने वाला हो-बेटा, आज इतनी देर क्यों हो गई? खाना खाया या नहीं? दिन कैसा रहा? हम थके हुए लौटें तो कोई प्रेम से सिर पर हाथ रख दे, दो पल पास बैठकर अपनेपन से बात कर ले।’
इतना सुनते ही वृद्ध दंपति की आंखें छलक उठीं।
कितनी गहरी विडंबना है जीवन की! जिनके घर में माता-पिता होते हैं, वे कई बार उनकी डांट को बंधन, उनकी चिंता को हस्तक्षेप और उनकी मौजूदगी को सामान्य समझ लेते हैं। लेकिन जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ जाता है, उन्हें वही आवाज, वही चिंता और वही अपनापन जीवनभर याद आता है।
माता-पिता घर की वह छांव हैं, जिसकी शीतलता का मूल्य अक्सर धूप में निकलने के बाद समझ आता है। उनके रहते घर केवल मकान नहीं, भावनाओं का संसार होता है।
इसलिए यदि आपके माता-पिता आपके साथ हैं, तो उन्हें केवल सुविधाएं नहीं, अपना समय भी दीजिए। उनके पास बैठिए, उनकी बातें सुनिए और कभी बिना किसी कारण उनका हाथ थाम लीजिए।
• याद रखिए-दुनिया में बहुत कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन माता-पिता का निस्वार्थ प्रेम नहीं। उनके रहते उनका सम्मान कीजिए, क्योंकि उनके जाने के बाद पछतावे के आंसू लौटकर उन्हें नहीं ला सकते।
