▪️सूर्यकांत उपाध्याय

विवाह के बाद मैं पत्नी के साथ शहर में रहने लगा था। एक दिन कई वर्ष पहले पिताजी मेरे घर आए। हम दोनों सोफे पर बैठे थे। मैं विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और भविष्य की उम्मीदों के बारे में उन्हें बता रहा था। वे चुपचाप मेरी बातें सुन रहे थे।
अचानक उन्होंने कहा, ‘अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। उम्र बढ़ने के साथ सच्चे दोस्त और भी जरूरी हो जाते हैं। बच्चों और परिवार को भरपूर प्यार देना, लेकिन पुराने दोस्तों के लिए भी समय जरूर निकालना। उनसे मिलना, साथ भोजन करना और न मिल सको तो फोन पर हालचाल पूछ लेना।’
उस समय मुझे उनकी बात कुछ अजीब लगी। मैंने मन ही मन सोचा, ‘अब मेरा परिवार ही मेरी दुनिया है, दोस्तों का क्या करूँगा?’
फिर भी मैंने उनकी सलाह मानी और अपने कुछ पुराने दोस्तों से संपर्क बनाए रखा।
समय बीता तो समझ आया कि पिताजी उस दिन कोई बहकी-बहकी बात नहीं कर रहे थे, बल्कि जीवन का गहरा अनुभव साझा कर रहे थे।
बच्चे बड़े हुए, उनकी अपनी जिम्मेदारियां और परिवार बन गए। नौकरी खत्म हुई। जिन लोगों के लिए कभी मेरी मौजूदगी बेहद जरूरी थी, वे भी समय के साथ मुझे भूल गए। लेकिन मेरे मुट्ठी-भर पुराने दोस्त आज भी मेरे साथ हैं।
उनके साथ बैठता हूं तो लगता है जैसे उम्र ठहर गई हो और जिंदगी फिर जवान हो गई हो। सच्चा दोस्त कभी रिटायर नहीं होता। वह कठिन समय में कभी नाव, कभी पतवार और कभी मल्लाह बनकर साथ देता है।
इसलिए जिंदगी की भागदौड़ में सच्ची दोस्ती के लिए समय जरूर बचाइए। मित्र कम हों, लेकिन ऐसे हों जो सुख में मुस्कुराएं और संकट में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें। क्योंकि सच्चे दोस्त जीवन का ऐसा टॉनिक हैं, जिसकी जरूरत उम्र बढ़ने के साथ और बढ़ती जाती है।
