▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों के साथ टहलते हुए श्रीराम से भरत ने पूछा, ‘एक बात पूछूं, भैया? माता कैकेयी ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिलकर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था? उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर भावी महाराज एवं महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा, तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई। ऐसे अपराध के लिए सामान्यतः मृत्युदंड दिया जाता है। फिर आपने माता कैकेयी को दंड क्यों नहीं दिया?’
राम मुस्कुराए और बोले, ‘जानते हो भरत, किसी कुल में यदि कोई चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले, तो उसका जीवन असंख्य पीढ़ियों के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो, उसे दंड कैसे दिया जा सकता है?’
भरत संतुष्ट नहीं हुए। बोले, ‘यह तो मोह है, भैया। राजा का दंड-विधान मोह से मुक्त होता है। आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक पूछ रहा है।’
राम गंभीर हो गए। कुछ क्षण मौन रहने के बाद बोले, ‘अपने सगे-संबंधियों के अपराध पर दंड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दंड है। माता कैकेयी ने अपनी एक भूल का बहुत कठोर दंड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई परिस्थितियों से लड़ते रहे, लेकिन माता कैकेयी हर क्षण भीतर से टूटती रहीं।
अपनी एक भूल के कारण उन्होंने पति, चारों पुत्र और अपना समस्त सुख खो दिया। वनवास समाप्त होने के बाद परिवार प्रसन्न हो गया, लेकिन वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?’
राम की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, ‘भरत, उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों? यदि मेरा वनवास न हुआ होता, तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुलनीय प्रेम को कैसे देख पाता? तुम दोनों ने मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता, तो संसार भाईचारे का आदर्श कैसे सीख पाता?’
भरत के सारे प्रश्न मौन हो गए। वे अनायास ही अपने बड़े भाई से लिपट गए।
