▪️सूर्यकांत उपाध्याय

नरोत्तम सेठ आज व्यस्त थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे को ईंट-भट्ठे पर भेज दिया। बेटे का मन भट्ठे के काम में नहीं लगता था और वह अक्सर ग्राहकों से बहस करने लगता था। सेठ चाहते थे कि बेटा धीरे-धीरे अपना पुश्तैनी काम सीख ले।
बेटा अभी अपने कमरे में बैठा ही था कि मुनीम ने आकर कहा, “भैया जी, एक बुजुर्ग फटी-पुरानी रसीद लेकर आए हैं। वे दस हजार ईंटें मांग रहे हैं।”
बेटे ने पूछा, “कैसी रसीद?”
मुनीम बोला, “वे कह रहे हैं कि 1968 में उन्होंने दस हजार ईंटों के लिए 150 रुपये जमा किए थे। उस समय ईंटों का भाव 15 रुपये प्रति हजार था।”
बेटा गुस्से में बोला, “आज दस हजार ईंटों की कीमत 80 हजार रुपये है। 150 रुपये में ईंटें कैसे दे दें? उन्हें वापस भेज दो।”
मुनीम ने कहा, “लेकिन रसीद पर आपके पिताजी के हस्ताक्षर हैं।”
इतने में नरोत्तम सेठ वहां आ गए। उन्होंने रसीद देखी और बुजुर्ग को पहचान लिया। मुस्कराते हुए बोले, “अरे धनीराम! इतने सालों बाद आए हो। तुम्हारे 150 रुपये आज भी हमारे पास हैं। अपनी दस हजार ईंटें ले जाओ।”
बेटे ने हैरानी से पूछा, “पिताजी, 80 हजार की ईंटें 150 रुपये में कैसे दे सकते हैं?”
सेठ ने समझाया, “बेटा, जब धनीराम ने पैसे जमा किए थे, तब ईंटों का वही भाव था। उनके 150 रुपये इतने वर्षों तक हमारे काम आए और हमने उनसे कमाई की। अब उनका हक उन्हें लौटाना हमारा धर्म है।”
फिर सेठ ने कहा, “तुम्हारे दादा कहते थे, ईमानदारी में कभी घाटा नहीं होता। व्यापार पैसे से नहीं, विश्वास से चलता है।”
उन्होंने मुनीम को ईंटें धनीराम के घर पहुंचाने का आदेश दिया और बेटे से कहा, “बेटा, हमेशा ईमानदार रहना। बेईमानी से कमाया धन ज्यादा दिन नहीं टिकता।”
