▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन सुबह एक भिखारी त्योहार के अवसर पर अधिक भिक्षा मिलने की आशा में घर से निकला। उसने अपनी झोली में थोड़े से चावल के दाने डाल लिए, ताकि झोली भरी हुई दिखाई दे और लोग उसे देखकर भिक्षा देने के लिए प्रेरित हों।
अभी सूर्योदय होने वाला था और रास्तों पर चहल-पहल शुरू ही हुई थी। तभी सामने से राजा का रथ आता दिखाई दिया। भिखारी ने सोचा कि आज राजा से अच्छी भिक्षा मिल जाएगी। वह प्रसन्न था कि जिस राजा के महल से उसे कभी भिक्षा नहीं मिली, वह आज स्वयं उसके सामने आ गया है।
लेकिन तभी आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा रथ से उतरा और याचक की तरह भिखारी के सामने खड़ा होकर बोला, ‘आज देश पर बड़ा संकट आया है। ज्योतिषियों ने उपाय बताया है कि मुझे अपना सब कुछ त्यागकर भिक्षा माँगनी होगी। तुम पहले व्यक्ति हो, जिससे मैं भिक्षा माँग रहा हूँ। कृपया मुझे कुछ दान दो, ताकि देश पर आया संकट टल सके।’
भिखारी असमंजस में पड़ गया। जीवनभर दूसरों से माँगने वाला आज किसी को क्या देता! आखिरकार उसने बड़ी मुश्किल से झोली से चावल का एक दाना निकाला और राजा को दे दिया। राजा प्रसन्न होकर आगे बढ़ गया।
दिनभर भिक्षा माँगने के बाद जब भिखारी घर लौटा, तो उसकी पत्नी ने झोली खाली करते समय उसमें सोने का एक चावल का दाना देखा। यह देखकर भिखारी छाती पीटकर रोने लगा। उसने बताया कि राजा को उसने चावल का एक दाना दिया था। पत्नी ने समझाया, ‘जो हम दूसरों को देते हैं, वही हमारे लिए सोना बन जाता है। जिसे हम केवल अपने लिए समेटकर रखते हैं, वह अंततः मिट्टी के समान रह जाता है।’
उस दिन भिखारी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने भिक्षा माँगना छोड़ दिया और मेहनत करके परिवार का पालन-पोषण करने लगा। धीरे-धीरे वह दूसरों की सहायता करने लगा और समाज में सम्मान पाने लगा।
- शिक्षा: देने का भाव मनुष्य को समृद्ध बनाता है, जबकि केवल पाने की लालसा उसे कभी संतुष्ट नहीं होने देती।
