■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया, ‘मेरी जन्मपत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था और मैं राजा बना।
किन्तु उसी घड़ी-मुहूर्त में अनेक जातकों का जन्म हुआ होगा, जो राजा नहीं बन सके। ऐसा क्यों…? इसका क्या कारण है?’
राजा के इस प्रश्न से सभी विद्वान निरुत्तर हो गए।
तभी एक वृद्ध खड़े होकर बोले, “महाराज, यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा रहते हैं। संभव है वे आपको उत्तर दे सकें।”
राजा घने जंगल में पहुँचा। वहाँ देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठकर अंगार (गरम कोयले) खा रहे थे।
राजा ने जैसे ही प्रश्न किया, महात्मा क्रोधित होकर बोले, “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच रहने वाले एक अन्य महात्मा दे सकते हैं।”
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गई। कठिन पहाड़ी मार्ग पार कर वह दूसरे महात्मा के पास पहुँचा। दृश्य देखकर राजा स्तब्ध रह गया, वे महात्मा चिमटे से अपना ही मांस नोच-नोचकर खा रहे थे।
उन्होंने भी डांटते हुए कहा, “मैं भूख से व्याकुल हूँ, मेरे पास समय नहीं है।
आगे एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है, जो थोड़ी देर ही जीवित रहेगा। वही तेरे प्रश्न का उत्तर देगा।”
राजा अत्यंत व्याकुल होकर उस गाँव पहुँचा। जैसे ही बालक का जन्म हुआ, दंपत्ति ने नाल सहित शिशु को राजा के समक्ष रखा।
राजा को देखते ही बालक मुस्कराकर बोला, “राजन्! मेरे पास भी अधिक समय नहीं है, फिर भी उत्तर सुन लो।
तुम, मैं और वे दोनों महात्मा, सात जन्म पूर्व चारों भाई राजकुमार थे।
एक बार शिकार करते हुए हम तीन दिन तक भूखे-प्यासे भटकते रहे।
तभी हमें आटे की एक पोटली मिली और हमने चार बाटियाँ सेंकीं।
उसी समय एक भूखे महात्मा आए।
पहले भाई से उन्होंने बाटी मांगी पर उसने क्रोध में मना कर दिया। दूसरे और तीसरे भाई ने भी दया नहीं की।
अंत में वे आपके पास आए। आपने प्रसन्नता और करुणा से आधी बाटी उन्हें दे दी।
महात्मा ने आशीर्वाद दिया, ‘तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा। आज उसी कर्मफल को हम सब भोग रहे हैं।”
यह कहकर बालक प्राण त्याग गया।
राजा ने स्वीकार किया, शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं-ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र।
हर व्यक्ति वही पाता है- जो उसने किया, दिया और लिया। यही जीवन का सत्य है।
