■ सूर्यकांत उपाध्याय

विदेश में एक डकैती के दौरान चोर ने बैंक में मौजूद सभी लोगों से चिल्लाकर कहा- “हिलो मत! पैसा सरकार का है, तुम्हारी जान तुम्हारी है।” बैंक में मौजूद सभी लोग चुपचाप ज़मीन पर लेट गए।
इसे कहते हैं “सोचने का तरीका बदलना”- पारंपरिक मानसिकता को बदलना।
तभी एक महिला मेज पर लेट गई। यह देखकर चोर चिल्लाया, “कृपया सभ्य बनो!”
इसे कहते हैं “पेशेवर होना”-सिर्फ उसी काम पर ध्यान देना, जिसके लिए तुम्हें प्रशिक्षित किया गया है।
जब लुटेरे घर लौटे तो छोटे चोर (जिसके पास डिग्री थी) ने बड़े चोर (जिसने केवल छठी कक्षा तक पढ़ाई की थी) से कहा—
“बड़े भाई, चलो गिनते हैं कि हमें कितना मिला।”
बूढ़े चोर ने जवाब दिया, “तुम कितने बेवकूफ़ हो! इतना सारा पैसा है, इसे गिनने में तो बहुत समय लग जाएगा। आज रात टीवी पर खबर आ जाएगी कि हमने कितना चुराया है।”
इसे कहते हैं “अनुभव”। आज के समय में अनुभव शैक्षणिक योग्यताओं से कहीं अधिक मूल्यवान है।
लुटेरों के जाने के बाद बैंक मैनेजर ने सुपरवाइज़र से तुरंत पुलिस को बुलाने को कहा। लेकिन सुपरवाइज़र बोला, “रुको! पहले बैंक से 10 मिलियन डॉलर निकाल लेते हैं और उन्हें उन 70 मिलियन डॉलर में जोड़ देते हैं, जो हम पहले ही गबन कर चुके हैं।”
इसे कहते हैं “हालात के साथ चलना”, प्रतिकूल स्थिति को लाभ में बदलना।
फिर सुपरवाइजर ने कहा, “कितना अच्छा होता, अगर हर महीने एक डकैती होती।”
इसे कहते हैं “ऊब मिटाना”। व्यक्तिगत खुशी काम से अधिक महत्वपूर्ण है।
अगले दिन खबर आई कि बैंक से 10 करोड़ डॉलर चोरी हो गए हैं।
लुटेरों ने बहुत गिनती की, लेकिन उन्हें सिर्फ 2 करोड़ डॉलर ही मिले।
गुस्से में उन्होंने कहा, “हमने अपनी जान जोखिम में डाली और हमें सिर्फ 2 करोड़ डॉलर मिले। बैंक मैनेजर ने तो पलक झपकते ही 8 करोड़ डॉलर कमा लिए! लगता है चोर बनने से बेहतर है शिक्षित होना।”
इसे कहते हैं “ज्ञान सोने के बराबर कीमती है।”
इधर, बैंक मैनेजर मुस्कुरा रहा था। इस बात से राहत महसूस करते हुए कि शेयर बाजार में हुए उसके नुकसान की भरपाई अब इस चोरी से हो गई है।
इसे कहते हैं “मौके का फायदा उठाना”, जोखिम उठाने की हिम्मत रखनी चाहिए क्योंकि इसी में जीवन का असली आनंद है।
