■ सूर्यकांत उपाध्याय

रात के 11 बज रहे थे, तभी अचानक घर की घंटी बजी। रवि चौंक गया, इतनी रात को कौन आया होगा?
दरवाजा खोलकर बाहर आया तो सामने एक वृद्ध सज्जन खड़े थे। वे ऑटो से आए थे और तेज़ी से हाँफ रहे थे। उन्होंने रवि से पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम?”
उसने कहा, “रवि।”
वृद्ध सज्जन भावुक होकर बोले, “हे भगवान, तेरा लाख-लाख धन्यवाद… घर मिल गया।” रवि कुछ समझ पाता, उससे पहले ही उन्होंने पूछा, “पानी मिलेगा?”
रवि ने कहा, “आइए, घर के अंदर आइए,” और उन्हें पानी पिलाया।
इसके बाद वृद्ध सज्जन ने रवि के हाथ में एक चिट्ठी थमा दी। रवि ने चिट्ठी पढ़ी और दूसरे कमरे में चला गया। तीन-चार मिनट बाद वह वापस आया, ऑटो चालक से बोला, “भाई साहब, आप जा सकते हैं।”
फिर वृद्ध सज्जन का सामान उतारकर घर के अंदर ले आया और कहा, “अंकल, रात बहुत हो गई है। आप आराम कीजिए, आपका काम मैं कल सुबह कर दूँगा।”
उस चिट्ठी में रवि के पिता ने उसके नाम कुछ लिखा था। वृद्ध सज्जन ने बताया,
“तुम्हारे पिता ने मुझे भरोसा दिलाया था कि उनका बेटा मेरा काम ज़रूर करेगा, इसलिए बिना किसी चिंता के मैं यहाँ चला आया।”
दरअसल, वृद्ध सज्जन के एकमात्र पुत्र का सड़क दुर्घटना में अचानक देहांत हो गया था। घर में केवल बुज़ुर्ग दंपती रह गए थे। लालन-पालन तो दूर, दैनिक खर्चों की पूर्ति भी कठिन हो गई थी।
वे अपने बेटे की मृत्यु का मुआवजा लेना नहीं चाहते थे, लेकिन जब कोई रास्ता नहीं बचा तो मजबूरी में इसके लिए आगे बढ़ना पड़ा। प्रक्रिया के दौरान उन्हें पता चला कि एक आवश्यक दस्तावेज़ दिल्ली जाकर प्रमाणित कराना होगा।
वर्षों से वे अपने छोटे से गाँव से बाहर नहीं निकले थे। दिल्ली उन्हें बेहद बड़ी और डरावनी लगती थी। तभी उनके पुराने मालिक ने अपने बेटे के नाम से एक चिट्ठी लिखकर दी कि वहाँ जाकर रवि से मिलना, वह आपकी मदद करेगा।
अगली सुबह अंकल उठे। रवि ने उन्हें अच्छा नाश्ता कराया, अपनी गाड़ी में बैठाया और स्वयं छुट्टी लेकर उस कार्यालय पहुँचा, जहाँ कड़ी मेहनत के बाद आवश्यक दस्तावेज़ प्रमाणित करा दिए।
काम पूरा होने पर रवि ने उनके लिए बस का टिकट कराया, साथ में मिठाई का एक डिब्बा दिया और बस स्टैंड तक छोड़ने गया। जाते समय वृद्ध सज्जन ने हाथ जोड़कर कहा, “रवि, तुम्हारे पिता धन्य हैं कि उन्होंने तुम्हारे जैसी संतान को जन्म दिया। वे सचमुच भाग्यशाली हैं।
क्या तुम कुछ कहना चाहते हो? मैं तुम्हारे पिता तक संदेश पहुँचा दूँगा।”
रवि एक पल के लिए शांत हो गया। फिर धीरे से बोला,“माफ कीजिएगा अंकल, मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।”
वृद्ध सज्जन बोले, “कहिए बेटा।”
रवि ने कहा,“अंकल, मैं वह रवि नहीं हूँ जिससे आप मिलने आए थे।”
वृद्ध सज्जन हैरान होकर बोले,“पर बेटा, तुम्हारे घर के बाहर तो ‘रवि निवास’ लिखा था।”
रवि मुस्कराया,“हाँ, यह मेरा घर है और मेरा नाम भी रवि है, लेकिन मैं वह रवि नहीं हूँ जिसे आप ढूँढने आए थे।”
जब वृद्ध सज्जन कुछ समझ नहीं पाए, तो रवि ने कहा,“कल रात जब आप आए थे, आप थके हुए थे, लेकिन आपकी आँखों में यह विश्वास था कि कोई आपकी मदद ज़रूर करेगा।
चिट्ठी पढ़ने के बाद मैंने उस रवि को फोन किया। वह बाहर गया हुआ था और कई दिनों बाद लौटने वाला था। आपको देखकर मुझे अपने पिता याद आ गए, जिनके लिए मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाया।
आपकी उम्र और भावनाओं को देखते हुए मुझे आपको लौटाने की हिम्मत नहीं हुई। तभी मैंने तय कर लिया कि आपका काम मैं ही करूँगा।”
यह सुनते ही वृद्ध सज्जन की आँखों से आँसू बहने लगे। वे बोले,
“तुम उस रवि को जानते भी नहीं थे?”
रवि ने कहा,“नहीं अंकल, मैं उन्हें नहीं जानता। आपकी चिट्ठी में उनका नंबर था, बस वहीं से बात हुई।”
वृद्ध सज्जन ने भावुक होकर कहा,“फिर भी तुमने मेरे लिए छुट्टी ली, इतना सब किया… कौन कहता है कि भगवान नहीं होता?”
यह कहते-कहते वे बस में बैठ गए और चले गए।
रवि घर लौटा और उस रात उसे अपने जीवन की सबसे सुकूनभरी नींद आई।
