■ सूर्यकांत उपाध्याय

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था? यदि स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने के लिए उस समय की भौगोलिक स्थिति को समझना आवश्यक होता है। ग्रंथों में गहराई से प्रवेश करें तो ज्ञात होता है कि समुद्र मंथन के समय बिहार, बंगाल, झारखंड, उड़ीसा आदि क्षेत्र जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से तब अस्तित्व में ही नहीं थे।
समुद्र मंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस काल में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी भूमि का ही निर्माण कर पाई थीं। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। यदि इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। आज भी विश्व का प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन, इसी प्रक्रिया का प्रमाण है।
कथा है कि जब समुद्र मंथन की योजना बनी तो मंदार पर्वत को मथनी बना लिया गया, कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन प्रश्न उठा कि मथनी की रस्सी कहाँ से लाई जाए? तब सर्वसम्मति से यह निश्चय हुआ कि हिमालय की कंदराओं में विश्राम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह कार्य कराया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में नहीं थी।
अब समस्या यह थी कि उन्हें लाए कौन?
नागराज इतने विशाल थे कि यदि वे लहरिया शैली में रेंगते तो टकराव होने लगता। इसलिए वे अधिकतर समय विश्राम ही करते थे। तब कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेटकर चल दिए। नागराज को निर्धारित स्थान तक पहुँचाकर भोलेनाथ वहीं एक स्थान पर बैठ गए।
जब मंथन प्रारंभ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। एक ओर से देवता खींचते, दूसरी ओर से असुर, और बीच में मंदराचल की चोट। क्षुब्ध होकर नागराज फुफकारने लगे। सोचिए, जिस नाग को एक पर्वत के चारों ओर लपेट दिया गया हो, वह कितना विशाल होगा। उनके फुफकारने से समस्त सृष्टि में विष फैलने लगा। हाहाकार मच गया।
एक ओर देवता और असुर भाग खड़े हुए, दूसरी ओर नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए।
अब करें तो करें क्या?
देवताओं की सभा बुलाई गई। प्रश्न उठा इस हलाहल को कौन पिएगा?
भगवान विष्णु ने भोले बाबा के चरण पकड़ लिए और निवेदन किया, “बाबा, यह आप ही पी सकते हैं।”
जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही विष आता है। बाबा उठे, पहले हलाहल पिया और फिर नागराज वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि भी प्रकट नहीं हुए थे। उनसे भी प्राचीन वैद्य हैं वैद्यनाथ।
बाबा ने हलाहल तो पी लिया, लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वे वहीं एक स्थान देखकर बैठ गए। उसी समय मंथन से निकले चंद्रमा के एक अंश को अलग कर भगवान के सिर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस अंश से निरंतर शीतल जल महादेव के मस्तक पर गिरता रहता है।
अब प्रश्न है, यह क्षेत्र कहाँ है, जहाँ समुद्र मंथन हुआ था?
बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत और उसके आसपास का क्षेत्र ही समुद्र मंथन का स्थान माना जाता है। आज भी झारखंड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भंडार है, जिसका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मान्यता है कि मंदार क्षेत्र में आज भी समुद्र मंथन से निकली अनेक निधियाँ छिपी हुई हैं।
भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह वासुकीनाथ कहलाया। जहाँ उन्होंने विष ग्रहण किया और नागराज का उपचार किया, वह स्थान वैद्यनाथ धाम देवघर है। चंद्रमा का जो अंश उनके मस्तक पर स्थापित किया गया था, वह आज भी विद्यमान है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है।
यह अंश भोलेनाथ के ठीक ऊपर, मंदिर के शिखर के नीचे स्थापित है। इसका नाम है, चंद्रकांत मणि।
