■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक धनवान सेठ थे, जो श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे दिन-रात कान्हा का नाम जपते और प्रतिदिन स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर मंदिर में भोग लगाने जाते।
परंतु उनके साथ एक विचित्र बात होती जैसे ही वे रास्ते में चलते, उन्हें नींद आ जाती और जब आँख खुलती तो सारे पकवान गायब मिलते। यह देखकर वे बहुत दुखी होते और कान्हा से शिकायत करते-
“प्रभु! मैं आपके लिए भोग बनाता हूँ, फिर भी आपको अर्पित क्यों नहीं कर पाता?”
तब कान्हा मुस्कुराकर कहते-
“वत्स, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जो मेरे भाग्य में होगा, वही मेरे पास आएगा।”
सेठ को यह बात समझ नहीं आई। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया-
“प्रभु! कल मैं आपको भोग लगाकर ही रहूँगा।”
अगले दिन वे सुबह-सुबह उठे, स्नान किया और अपनी पत्नी से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनवाए। चार डिब्बों में भरकर वे मंदिर के लिए निकल पड़े और मन ही मन सोचते रहे-
“आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सोऊँगा नहीं।”
रास्ते में उन्हें एक भूखा, दुबला-पतला छोटा बच्चा मिला, जो हाथ फैलाकर भोजन माँग रहा था। सेठ का हृदय पिघल गया और उन्होंने उसे एक लड्डू दे दिया।
जैसे ही बच्चे को लड्डू मिला, वहाँ कई और भूखे बच्चे आ गए। उनकी हालत देखकर सेठ से रहा नहीं गया, और उन्होंने सबको भोजन बाँटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सारे पकवान बच्चों में बाँट दिए गए।
तभी उन्हें याद आया-
“अरे! आज तो मैंने कान्हा को भोग लगाने का वचन दिया था…”
थोड़े उदास मन से वे मंदिर पहुँचे और श्रीकृष्ण के सामने बैठ गए। तभी कान्हा प्रकट हुए और प्रेम से बोले-
“जल्दी लाओ मेरा भोग, मुझे बहुत भूख लगी है!”
सेठ ने संकोच से सारी बात बता दी।
कान्हा मुस्कुराए और बोले-
“मैंने पहले ही कहा था, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जिनके नाम थे, उन्होंने खा लिया। तुम व्यर्थ चिंता क्यों करते हो?”
फिर कान्हा सेठ को अपने साथ उन बच्चों के पास ले गए।
सेठ ने देखा-उन भूखे बच्चों के बीच स्वयं कृष्ण विभिन्न रूपों में भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कान्हा बोले-
“मैं हर जीव में उपस्थित हूँ। जब तुमने उन बच्चों को खिलाया, तब वास्तव में तुमने मुझे ही भोग लगाया। मैं अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग स्थानों पर वही स्वीकार करता हूँ जो मेरे भाग्य में होता है।”
यह सुनकर सेठ भाव-विभोर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले-
“प्रभु, आपकी लीला अपरंपार है।”
कान्हा हँसते हुए बोले-
“कल फिर भोग बनाना… और इस बार भी मुझे ही देना!”
सेठ और भगवान दोनों मुस्कुरा उठे।
● संदेश: जहाँ करुणा और सेवा है, वहीं भगवान का सच्चा निवास है।
