■ सूर्यकांत उपाध्याय

राजस्थान की पावन धरती पर, सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा के बीच स्थित मेंहदीपुर धाम श्रद्धा, आस्था और चमत्कार का अद्भुत संगम है। दो पहाड़ियों के मध्य बसे इस पवित्र स्थान पर विराजमान श्री मेंहदीपुर बालाजी को ‘घाटे वाले बाबा’ के नाम से भी जाना जाता है। यहां आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करता बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव से गुजरता है।
मान्यता है कि बालाजी की यह बालरूप मूर्ति स्वयंभू है, जिसे किसी कलाकार ने नहीं गढ़ा। यह मूर्ति पर्वत के अखंड भाग के रूप में मंदिर की पिछली दीवार का भी कार्य करती है। मूर्ति के वक्षस्थल से निरंतर बहने वाली पवित्र जलधारा भक्तों के लिए दिव्य वरदान मानी जाती है, जिसे चरणामृत के रूप में ग्रहण किया जाता है।
मेंहदीपुर बालाजी धाम विशेष रूप से भूत-प्रेतादि बाधाओं, मानसिक कष्टों और अदृश्य पीड़ाओं से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। देश-विदेश से आने वाले कष्टग्रस्त लोग यहाँ आकर बिना औषधि और तंत्र-मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं। यह चमत्कार नहीं, बल्कि श्रद्धा की शक्ति का प्रमाण माना जाता है।
इस धाम में बालाजी महाराज के साथ श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान भैरव की भी उपस्थिति है। प्रेतराज सरकार दंडाधिकारी हैं, जो दुष्ट आत्माओं को दंड देते हैं, जबकि भैरव जी कोतवाल के रूप में व्यवस्था संभालते हैं। तीनों देवताओं को प्रसाद अर्पित कर भक्त अपने कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं।
कहा जाता है, ‘नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में।’
वास्तव में, मेंहदीपुर बालाजी केवल एक मंदिर नहीं बल्कि विश्वास, संयम और आत्मिक शुद्धि की जीवंत पाठशाला माना जाता है, जहां टूटे मन को संबल मिलता है।
