■ सूर्यकांत उपाध्याय

दो भाई परस्पर बड़े ही स्नेह और सद्भावपूर्वक रहते थे।
दोनों भाई जब भी कोई वस्तु लाते, तो एक-दूसरे के परिवार के लिए भी अवश्य लाते। छोटा भाई सदा बड़े भाई को आदर और सम्मान की दृष्टि से देखता था।
एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा-सुनी हो गई। बात इतनी बढ़ गई कि छोटे भाई ने बड़े भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस, फिर क्या था!
दोनों के रिश्तों में दरार पड़ गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और आपसी बोलचाल भी बंद हो गई।
इसी तरह कई वर्ष बीत गए।
मार्ग में जब दोनों आमने-सामने मिल भी जाते, तो कतराकर दृष्टि बचा लेते।
कुछ वर्षों बाद छोटे भाई की कन्या का विवाह तय हुआ। उसने सोचा, बड़े आखिर बड़े ही होते हैं, जाकर मना लेना चाहिए। अब ऐसी भी क्या नाराजगी!
वह बड़े भाई के पास गया और उनके पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला,
“अब चलिए और विवाह का कार्य संभालिए।”
पर बड़ा भाई नहीं पसीजा। उसने उसके घर चलने से साफ मना कर दिया।
छोटे भाई को बहुत दुःख हुआ। वह इसी चिंता में रहने लगा कि किसी तरह भाई को कैसे मनाया जाए।
इधर विवाह में भी बहुत ही थोड़े दिन शेष रह गए थे। सगे-संबंधियों का आना-जाना शुरू हो गया था।
एक संबंधी ने बताया, “तुम्हारा बड़ा भाई प्रतिदिन एक संत के पास जाता है और उनका बहुत आदर करता है, तथा उनकी बातों को मानता भी है।”
छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और सारी बातें बताते हुए अपनी गलती के लिए क्षमा-याचना की। उसने गहरा पश्चात्ताप व्यक्त करते हुए उनसे प्रार्थना की, “आप किसी भी तरह मेरे भाई को मेरे यहाँ आने के लिए राजी कर दीजिए।”
दूसरे दिन जब बड़ा भाई सत्संग में गया, तो संत ने उससे पूछा, “क्यों, तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है? तुम कौन-कौन से काम संभाल रहे हो?”
बड़ा भाई बोला,“मैं तो विवाह में सम्मिलित ही नहीं हो रहा, गुरुदेव। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।”
संत जी ने कहा, “सत्संग के बाद मुझसे मिलकर जाना, एक जरूरी काम है।”
सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा। संत ने पूछा, “मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था, उसमें मैंने क्या कहा था? जरा याद करके बताओ।”
बड़ा भाई बिल्कुल मौन रह गया।
काफी देर सोचने के बाद हाथ जोड़कर बोला, “क्षमा चाहता हूँ, गुरुदेव। मुझे कुछ याद नहीं आ रहा कि विषय क्या था।”
संत बोले, “देखा! मेरी बताई हुई अच्छी बातें तो तुम्हें आठ दिन भी याद नहीं रहीं, और छोटे भाई के कड़वे शब्द, जो वर्षों पहले कहे गए थे, वे आज भी तुम्हारे हृदय में चुभ रहे हैं।
जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तो उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे?
और जब जीवन नहीं सुधरा, तो सत्संग में आने का लाभ ही क्या रहा?
अतः कल से यहाँ मत आया करना।
बेकार अपना समय व्यर्थ मत करो।”
अब बड़े भाई की आँखें खुल गईं। उसने आत्म-चिंतन किया और स्वीकार किया, “मैं वास्तव में गलत मार्ग पर हूँ।”
इसके बाद वह अपने छोटे भाई के घर गया और उसे गले से लगा लिया। दोनों भाइयों की आँखों में खुशी के आँसू थे।
