■ सूर्यकांत उपाध्याय

शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।
शबरी की उम्र कम थी। वह महर्षि मतंग का हाथ पकड़कर रोने लगी। शबरी को रोते देख महर्षि व्याकुल हो उठे। उन्होंने शबरी को समझाया, “पुत्री, इस आश्रम में भगवान आएंगे। तुम यहीं प्रतीक्षा करो।”
अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, फिर भी उसने पूछा, “कब आएंगे…?”
महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत, भविष्य और वर्तमान, सब जानते थे। वे ब्रह्मर्षि थे।
महर्षि शबरी के सामने घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया। आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए। यह उलट कैसे हो रहा है? गुरु यहाँ शिष्य को नमन कर रहे हैं, यह कैसे संभव है?
महर्षि के तेज के सामने कोई कुछ बोल न सका।
महर्षि मतंग बोले, “पुत्री, अभी उनका जन्म नहीं हुआ है। अभी राजा दशरथ का लग्न भी नहीं हुआ है। उनका विवाह कौशल्या से होगा, फिर भगवान की लंबी प्रतीक्षा होगी।
फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा, फिर प्रतीक्षा…फिर उनका विवाह कैकई से होगा, फिर प्रतीक्षा।
फिर वे जन्म लेंगे। फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा। फिर उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिलेगा। और वनवास के अंतिम वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहाँ आएंगे।
तुम उनसे कहना, ‘आप सुग्रीव से मित्रता कीजिए, उसे आततायी बाली के संताप से मुक्त कीजिए, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।’”
शबरी एक क्षण के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।
वह अधीर होकर फिर पूछ बैठी, “इतनी लंबी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी, गुरुदेव?”
महर्षि मतंग बोले, “वे ईश्वर हैं, अवश्य ही आएंगे। यह भावी निश्चित है।
लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल-दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते हैं। पर आएंगे अवश्य…!
जन्म-मरण से परे वे जब चाहें, तब प्रह्लाद के लिए खंभे से भी प्रकट हो सकते हैं।इसलिए प्रतीक्षा करना। वे कभी भी आ सकते हैं। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे स्मरण करेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।”
शबरी गुरु के आदेश को मानकर वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहने लगी।
वह जानती थी कि समय का चक्र उनकी उँगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकते हैं। वह हर दिन मार्ग में फूल बिछाती, चारों ओर पुष्प सजा कर हर क्षण प्रतीक्षा करती रहती। शबरी बूढ़ी हो गई, लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।
और एक दिन, उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आँखों से अश्रुओं की धारा बह निकली।
गुरु का कथन सत्य हुआ। भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का यह फल रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया था, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।
ऐसे पतित-पावन, मर्यादा पुरुषोत्तम, दीन-हितकारी श्रीराम जी की जय हो-जय हो, जय हो।
एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारने के बाद वृद्धा भीलनी के मुख से शब्द फूटे, “कहो राम! शबरी की कुटिया ढूँढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?”
राम मुस्कुराए, “यहाँ तो आना ही था, माँ।”
“जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे। यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो, कैसे दिखते हो, क्यों मेरे पास आओगे। बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।”
राम ने कहा, “तभी तो मेरे जन्म से पहले ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में आना है।”
राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में केवल तुमसे मिलने आया है, माँ! ताकि सहस्त्रों वर्षों बाद जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न उठाए, तो इतिहास चिल्लाकर उत्तर दे-‘इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।
