■ सूर्यकांत उपाध्याय

दिनभर का थका-हारा अविनाश डिनर करके अपने बेडरूम में जाकर लेट ही रहा था कि पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला उसका बेटा मनु आकर पूछ बैठा, “पापा… आपने मुहावरे पढ़े हैं?”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं,” थके होने के बावजूद उसके स्वर में उत्साह था।
“तो पापा, ‘झाँसे में आना’ का क्या अर्थ है?” अपनी कॉपी खोलकर मनु ने पूछा।
“वेरी सिम्पल बेटा… धोखे में आना।”
“अच्छा पापा… आप कभी झाँसे में आए हैं?” मनु के इस सवाल पर अविनाश दीवार पर टँगी अपने माता-पिता की तस्वीर को देखकर धीरे-से बोला,
“हाँ… बहुत बार…”
और वह सोचने लगा। बचपन में जब वह दूध पीने में आना-कानी करता था, तो माँ उसे प्यार से कहती थीं, “मेरा राजा बेटा… एक घूँट में दूध खत्म कर लेगा तो जल्दी-से बड़ा हो जाएगा।”
इस झाँसे में आकर वह माँ के हाथों से न जाने कितने गिलास दूध पी गया था।
बाबा तो अक्सर ही उसे “बस थोड़ी दूर और” कहकर उससे दौड़ लगवा लेते थे। तब उसे बाबा पर बहुत गुस्सा आता था, लेकिन जब वह स्कूल की दौड़-रेस में प्रथम आया, तब बाबा पर उसे बहुत प्यार आया था।
एक दिन स्कूल से घर आया तो बाबा को सफेद कपड़े में लिपटा आँगन के फर्श पर शांत लेटे देखा। वह कुछ समझ नहीं पाया। लोग उन्हें लेकर कहीं जाने लगे तो वह रोने लगा। माँ भी चुप थीं। तब काकी ने उससे कहा कि अस्पताल ले जा रहे हैं, घंटे भर में वापस ले आएँगे लेकिन बाबा फिर नहीं लौटे। कुछ दिनों बाद माँ भी उसे अनाथ कर गईं।
उसका पढ़ाई से जी उठ गया था। तब ताई ही उसे समझाती थीं, “देख अवि… पढ़ेगा नहीं तो तू अपनी माँ को भगवान के घर से वापस कैसे लाएगा।”
माँ को वापस लाने की चाह में वह ताई के दिए उस झाँसे में आ गया और उसने आठवीं पास कर ली। तब उसे समझ आया कि माँ-बाबा तो अब कभी नहीं…
फिर तो वह पढ़ाई करता ही गया और एक दिन डॉक्टर की डिग्री लेकर माँ-बाबा की तस्वीर के सामने खड़ा हो गया।
ताई कहती थीं कि जब तू मरीजों का इलाज करेगा, तो तेरे माँ-बाबा की आत्मा तृप्त हो जाएगी। ठीक ही तो कहती थीं। बचपन में माता-पिता के द्वारा दिखाए गए वे सब्ज़बाग कितने खूबसूरत होते थे, कभी बड़ी घोड़ा-गाड़ी दिलाने के, तो कभी लाल किला घुमाने के झाँसे…
“पापा, आपने बताया नहीं कि आप किसके झाँसे में आ गए थे?” मनु ने अविनाश का हाथ हिलाते हुए फिर पूछा तो उसकी सोच को विराम लगा।
हँसते हुए वह बोला, “तुम्हारी दादी के…”
और फिर वह मनु को उसकी दादी के बारे में बताने लगा।
