■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक इंसान रात-दिन कठोर परिश्रम करता था, लोगों की सेवा करता, सबके लिए अच्छा सोचता और सबके दुख में साथ देता था। इसके बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। उस इंसान ने साधु से कहा, जब भी आपकी प्रभु से भेंट हो, तो मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
कुछ दिनों बाद वही साधु उससे फिर मिला। उस इंसान ने अपनी फरियाद की याद दिलाई। तब साधु ने कहा, “प्रभु ने बताया है कि उस इंसान की आयु 60 वर्ष है और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए केवल पाँच बोरी अनाज है। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा-थोड़ा अनाज देते हैं, ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।”
समय बीता। साधु फिर उस इंसान से मिला। तब उस इंसान ने कहा, “ऋषिवर! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो, तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वे मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूँ।”
अगले ही दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि उस इंसान के घर ढेर सारा अनाज पहुँच गया। उसने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद स्वीकार कर ली है और उसका पूरा हिस्सा भेज दिया है। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज से भोजन बनवाया, फकीरों और भूखों को खिलाया और स्वयं भी भरपेट खाया।
लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज फिर उसके घर पहुँच गया है। उसने दोबारा गरीबों को खिलाया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज़-रोज़ चलता रहा और वह इंसान काम करने के बजाय गरीबों को भोजन कराने में व्यस्त रहने लगा।
कुछ दिन बाद साधु फिर उससे मिला। तब उस इंसान ने कहा, “ऋषिवर! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में केवल पाँच बोरी अनाज है, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता है।”
साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपने हिस्से का अनाज गरीबों और भूखों को खिला दिया। इसलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
कथासार-
किसी को कुछ देने की शक्ति वास्तव में हमारे भीतर नहीं होती। फिर भी हम देते समय यह मान लेते हैं कि हमने दिया। दान हो, वस्तु हो, ज्ञान हो, यहाँ तक कि अपने बच्चों को कुछ दिलाते समय भी हम कहते हैं, मैंने दिलाया। जबकि सच्चाई यह है कि वह सब उनका अपना होता है। परमात्मा हमें केवल निमित्त बनाते हैं, ताकि उनकी आवश्यकताएँ उन तक पहुँच सकें। फिर निमित्त होने का घमंड कैसा…?
