■ पद्मश्री से सम्मानित गौड़ा ने आय का बड़ा हिस्सा किताबों पर खर्च किया
■ किताबों का संग्रह बढ़ाने के लिए मैसूर स्थित अपना घर तक बेच दिया
■ साहित्य, विज्ञान, तकनीक, दर्शन, पौराणिक कथाएं, इतिहास, प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री, दुर्लभ पांडुलिपियां, अख़बार, जर्नल और करीब 5,000 शब्दकोश उपलब्ध

● बेंगलुरू
कर्नाटक के मांड्या जिले में श्रीरंगपटना के पास हरलाहल्ली गांव की गलियों में स्थित ‘पुस्तक माने’ अर्थात ‘किताबों का घर’ एक व्यक्ति के ज्ञान-समर्पण का जीवंत प्रमाण है। यह न तो विश्वविद्यालय है और न ही सरकारी संस्था, बल्कि एक निःशुल्क सार्वजनिक पुस्तकालय है, जो जुनून, त्याग और निरंतर प्रयास से खड़ा हुआ।
इसके संस्थापक 75 वर्षीय अंके गौड़ा को इस वर्ष साक्षरता, अध्ययन और पुस्तकों तक पहुंच बढ़ाने में उनके असाधारण योगदान के लिए ‘अनसंग हीरोज़’ श्रेणी में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। वर्ष 1951 के आसपास मांड्या जिले के चिनाकुर्ली गांव के एक किसान परिवार में जन्मे गौड़ा के बचपन में किताबों तक पहुंच सीमित थी। कॉलेज के दिनों में एक प्रोफेसर की प्रेरणा ने उन्हें पढ़ने और पुस्तकें संग्रहित करने की राह दिखाई यही सलाह उनके जीवन की दिशा बन गई।
बीस वर्ष की उम्र में बस कंडक्टर के रूप में काम करते हुए उन्होंने हर खाली पल पढ़ाई में लगाया। आगे चलकर उन्होंने कन्नड़ साहित्य में स्नातकोत्तर किया और लगभग तीन दशक तक एक शुगर फैक्ट्री में सेवाएं दीं। इन वर्षों में उन्होंने अपनी आय का बड़ा हिस्सा अनुमानतः 80 प्रतिशत किताबों पर खर्च किया। संग्रह बढ़ाने के लिए उन्होंने मैसूर स्थित अपना घर तक बेच दिया।

आज ‘पुस्तक माने’ में 20 से अधिक भारतीय व विदेशी भाषाओं की दो मिलियन से ज्यादा पुस्तकें हैं। साहित्य, विज्ञान, तकनीक, दर्शन, पौराणिक कथाएं, इतिहास, प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री, दुर्लभ पांडुलिपियां, अख़बार, जर्नल और करीब 5,000 शब्दकोश यहां उपलब्ध हैं। प्रवेश निःशुल्क है और यहां छात्र, शोधार्थी, लेखक तथा न्यायपालिका से जुड़े लोग भी आते रहे हैं।
अंके गौड़ा अपनी पत्नी विजयलक्ष्मी और बेटे सागर के साथ इसी पुस्तकालय में रहते हैं और रोज़ाना हाथों से संग्रह का प्रबंधन करते हैं। ग्रामीण परिवेश में स्थित यह पुस्तकालय डिजिटल दौर में भी पुस्तकों की शक्ति का सशक्त स्मरण कराता है, जहां ज्ञान बिना किसी बाधा के सबके लिए उपलब्ध है।
