■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक सेठजी बड़े कंजूस थे। एक दिन दुकान पर् बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया।
अकस्मात एक संत आये जो अलग अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे, लड़के से कहा बेटा जरा नमक दे दो। लड़के ने संत को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया।
सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था।
सेठजी ने कहा कि क्या बेचा?
बेटा बोला एक संत जो तालाब पर् रहते हैं, उनको एक चम्मच नमक दिया था।
सेठ का माथा ठनका, ‘अरे मूर्ख, इसमें तो जहरीला पदार्थ है।
अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए। संत भगवान को भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे।
सेठजी दूर से ही बोले, ‘महाराज जी रुकिए! आप जो नमक लाये थे, वो जहरीला पदार्थ था।आप भोजन नहीं करें।’
संत जी बोले, ‘भाई, हम तो प्रसाद लेंगे ही क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते। हाँ, अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नहीं करते।
उन्होंने भोजन शुरू कर दिया। सेठजी के होश उड़ गए, वहीं बैठ गए। रात हो गई। सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे।
सोचते-सोचते नींद आ गई। सुबह जल्दी ही संत उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं।
सेठजी ने कहा महाराज तबियत तो ठीक है। संत बोले, ‘भगवान की कृपा है, कह कर मंदिर खोला तो देखते हैं कि भगवान के श्रीविग्रह के दो भाग हो गए थे। शरीर काला पड़ गया था।
अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का जहर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया।
सेठजी ने घर आकर बेटे को घर-दुकान का कार्यभार सौंप दिया और स्वयं भक्ति करने संत की शरण में चले गए।
● शिक्षा – भगवान को निवेदन करके भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है।
