■ सूर्यकांत उपाध्याय

बुद्ध एक गाँव में गए। वहाँ कुछ लोग एक अंधे व्यक्ति को उनके पास लाए और बोले, “यह हमारा मित्र है। हम इसे समझाते हैं कि प्रकाश होता है, पर यह मानता नहीं। इसकी दलीलें इतनी मजबूत हैं कि हम हार जाते हैं। यह कहता है मैं प्रकाश को छूकर देखना चाहता हूँ। जब हम कहते हैं कि प्रकाश का स्पर्श नहीं हो सकता, तो यह कहता है ठीक है, मैं उसे सुन लूँ। प्रकाश में कोई आवाज़ करो। यदि वह भी संभव नहीं, तो स्वाद या गंध से अनुभव करा दो।”
लोग असहाय थे, क्योंकि प्रकाश केवल आँखों से देखा जा सकता है और उसके पास आँखें नहीं थीं। वह कहता था, “तुम मुझे अंधा सिद्ध करने के लिए प्रकाश की कहानी गढ़ते हो।”
बुद्ध ने कहा, “मैं इसे समझाने का प्रयास नहीं करूँगा। मनुष्य की बड़ी समस्या यह रही है कि उसे वे बातें समझाई जाती हैं जो वह स्वयं देख नहीं सकता। मैं इसे उपदेश नहीं दूँगा। तुम इसे किसी वैद्य के पास ले जाओ, जो इसकी आँखों का उपचार कर सके। इसे उपदेश नहीं, उपचार की आवश्यकता है। जब इसकी आँखें ठीक हो जाएँगी, तब इसे किसी समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”
लोगों को बात उचित लगी। वे उसे वैद्य के पास ले गए। कुछ महीनों के उपचार के बाद उसकी आँखें ठीक हो गईं। वह बुद्ध के पास पहुँचा और बोला, “मैं भ्रम में था। प्रकाश था, पर मेरी आँखें नहीं थीं।”
बुद्ध ने कहा, “तुम गलत थे, पर तुम्हारी जिद ने ही उपचार संभव किया। यदि तुम बिना देखे विश्वास कर लेते, तो उपचार का विचार ही न उठता।”
जो लोग केवल विश्वास कर लेते हैं, वे अनुभव तक नहीं पहुँचते। सच्ची यात्रा तब शुरू होती है, जब भीतर सत्य को स्वयं देखने की बेचैनी जागती है।
