■ सूर्यकांत उपाध्याय

पुरूरवा चंद्रवंश के संस्थापक, अत्यंत तेजस्वी, साहसी और गुणवान राजा थे, जबकि उर्वशी स्वर्ग की सबसे सुंदर और मोहिनी अप्सरा थीं। एक बार उर्वशी को किसी कारणवश, या देवताओं के किसी कार्य के चलते, कुछ समय के लिए मृत्युलोक (पृथ्वी) पर आना पड़ा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार दो राक्षस उर्वशी और उनकी सखी को हरण करके ले जा रहे थे। राजा पुरूरवा ने अपने पराक्रम से राक्षसों को पराजित किया और उर्वशी को छुड़ाया। इस घटना के बाद, पुरूरवा और उर्वशी का परिचय हुआ। उर्वशी राजा की वीरता और सौंदर्य पर मोहित हो गईं और पुरूरवा अप्सरा की अलौकिक सुंदरता और दिव्य आभा पर मुग्ध हो गए।
उर्वशी ने पुरूरवा से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन स्वर्ग की अप्सरा होने के नाते, उन्होंने उनके सामने तीन अत्यंत कठिन शर्तें रखीं:
- पुरूरवा को कभी भी उर्वशी के सामने नग्न अवस्था में नहीं आना चाहिए। उर्वशी तुरंत पुरूरवा को छोड़कर स्वर्ग वापस चली जाएंगी।
- पुरूरवा को उर्वशी के दो मेमने (अन्य स्रोतों में दो हंस या बकरी) पालने होंगे। उर्वशी इन मेमनों को अपनी संतान की तरह मानेंगी और पुरूरवा को हमेशा इनकी रक्षा करनी होगी। यदि मेमने गायब हो गए या उन्हें कोई नुकसान हुआ तो उर्वशी चली जाएंगी।
- उर्वशी प्रतिदिन केवल घी (मक्खन) का ही भोजन करेंगी।यदि इस नियम का उल्लंघन हुआ तो संबंध समाप्त हो जाएगा।
राजा पुरूरवा प्रेम में वशीभूत होकर इन सभी कठिन और अजीबोगरीब शर्तों को स्वीकार करते हैं, और दोनों प्रतिष्ठानपुर में सुखपूर्वक रहने लगते हैं।
स्वर्ग के देवता, विशेषकर इंद्र, उर्वशी के पृथ्वी पर लंबे समय तक रहने से चिंतित थे। उन्होंने पुरूरवा और उर्वशी को अलग करने की योजना बनाई। देवताओं ने गंधर्वों को पुरूरवा को धोखा देने और उर्वशी को वापस लाने का कार्य सौंपा।
गंधर्वों ने अंधेरी रात में उर्वशी के दो मेमनों का हरण कर लिया। मेमनों के चिल्लाने की आवाज सुनकर, उर्वशी व्याकुल हो गईं और पुरूरवा से चिल्लाकर कहा: “हाय! यह कैसा राजा है जो मेरी संतान की रक्षा भी नहीं कर सकता!”
पुरूरवा तुरंत उठे, और क्योंकि वह नग्न थे, उन्हें यह याद नहीं रहा कि शर्त क्या थी। उन्होंने आवेश में आकर बिना वस्त्र पहने ही गंधर्वों का पीछा किया।
इसी क्षण, गंधर्वों ने चाल चली और आकाश में बिजली चमका दी। इस प्रकाश में उर्वशी ने पुरूरवा को नग्न देख लिया।
शर्त टूट चुकी थी। उर्वशी उसी क्षण पुरूरवा को छोड़कर स्वर्ग के लिए अदृश्य हो गईं, अपने पीछे केवल विलाप करते राजा को छोड़ गईं।
उर्वशी के जाने के बाद पुरूरवा विरह की अग्नि में जल उठे। वह पागल से हो गए और उन्हें खोजने के लिए पूरी पृथ्वी पर घूमते रहे, प्रकृति से अपनी प्रियतमा का पता पूछते रहे। अंततः, पुरूरवा को कुरुक्षेत्र के पास उर्वशी मिल गईं, जब वह अपनी सखियों के साथ एक कमल-सरोवर में खेल रही थीं।
उर्वशी ने बताया कि वह अब वापस नहीं आ सकतीं, लेकिन उन्होंने राजा को दिलासा दिया कि वह उनके गर्भ में पल रहे पुत्र को जन्म देने के बाद वर्ष में एक बार पुरूरवा से मिल सकती हैं।
इस वार्षिक मिलन से उनके कई पुत्रों का जन्म हुआ (जैसे आयु)। इस तरह, उनका प्रेम शारीरिक रूप से अलग होने के बावजूद, वंश परंपरा के माध्यम से जारी रहा।
कालिदास के नाटक में, यह कथा एक सुखद अंत की ओर ले जाती है, जहाँ एक दैवीय आभूषण (संगीमनी मणि) की मदद से उर्वशी को पृथ्वी पर स्थायी रूप से रहने की अनुमति मिल जाती है।
पुरूरवा और उर्वशी की कहानी दिखाती है कि प्रेम दिव्य और मानवीय दोनों हो सकता है, लेकिन शर्तें और नियति इसे अक्सर अल्पकालिक बना देती हैं।
