■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बड़ी-सी गाड़ी आकर बाजार में रुकी। कार में ही मोबाइल से बातें करते हुए महिला ने अपनी बच्ची से कहा, “जा, उस बुढ़िया से पूछ, सब्जी कैसे दी है?”
बच्ची कार से उतरते ही बोली,
“अरे बुढ़िया, ये सब्जी कैसे दी?”
“40 रुपये किलो, बेबी जी…” सब्जी वाली ने उत्तर दिया।
सब्ज़ी लेते ही उस बच्ची ने सौ रुपये का नोट सब्जी वाली की ओर फेंक दिया और आकर कार में बैठ गई। कार आगे बढ़ने ही वाली थी कि अचानक किसी ने कार के शीशे पर दस्तक दी।
एक छोटी-सी बच्ची हाथ में 60 रुपये लिए कार में बैठी उस महिला को देते हुए बोली,
“आंटी जी, ये आपके सब्जी के बचे 60 रुपये हैं। आपकी बेटी भूल आई है।”
कार में बैठी महिला ने कहा, “तुम रख लो।”
उस बच्ची ने बड़ी ही मिठास और सभ्यता से कहा,
“नहीं आंटी जी, हमारे जितने पैसे बनते थे, हमने ले लिए। हम इसे नहीं रख सकते। मैं आपकी आभारी हूँ कि आप हमारी दुकान पर आईं। आशा करती हूँ कि सब्ज़ी आपको अच्छी लगे, जिससे आप हमारी ही दुकान पर हमेशा आएँ।”
उस लड़की ने हाथ जोड़े और अपनी दुकान पर लौट गई।
कार में बैठी महिला उस लड़की से बहुत प्रभावित हुई और कार से उतरकर फिर सब्ज़ी की दुकान की ओर जाने लगी। जैसे ही वह पास पहुँची, सब्जी वाली अपनी बच्ची से पूछ रही थी,
“तुमने तमीज से बात की ना? कोई शिकायत का मौका तो नहीं दिया ना?”
बच्ची ने कहा,
“हाँ माँ, मुझे आपकी सिखाई हर बात याद है-कभी किसी बड़े का अपमान मत करो, उनसे सभ्यता से बात करो, उनकी कद्र करो; क्योंकि बड़े-बुजुर्ग बड़े ही होते हैं। मुझे आपकी सारी बातें याद हैं और मैं सदैव इनका स्मरण रखूँगी।”
बच्ची ने फिर कहा,
“अच्छा माँ, अब मैं स्कूल चलती हूँ। शाम को स्कूल से छुट्टी होते ही दुकान पर आ जाऊँगी।”
कार वाली महिला शर्म से पानी-पानी थी, क्योंकि एक सब्जी वाली अपनी बेटी को इंसानियत, बड़ों से आदरपूर्वक बात करने और शिष्टाचार का पाठ पढ़ा रही थी, जबकि वह स्वयं अपनी बेटी के मन में ऊँच-नीच का बीज बो रही थी।
गौर करना दोस्त, सबसे अच्छा वही कहलाता है जो आसमान पर भी रहता है और ज़मीन से भी जुड़ा रहता है।
बस इंसानियत, भाईचारा, सभ्यता, आचरण, वाणी में मिठास और सबकी इज़्ज़त करने की सीख दीजिए अपने बच्चों को; क्योंकि अब यही वह पढ़ाई है जो आने वाले समय में सबसे अधिक कठिन होगी, इसे सीखने में, इसे याद रखने में, इसे ग्रहण करने में और जीवन को उपयोगी बनाने में।
