■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक नगर का राजा था। ईश्वर ने उसे सब कुछ दिया था। समृद्ध राज्य, सुशील और गुणवती पत्नी, संस्कारी संतान, सब कुछ उसके पास था, पर फिर भी वह हमेशा दुःखी ही रहता था।
एक बार वह घूमते-घूमते एक छोटे से गाँव में पहुँचा। वहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकियाँ बेच रहा था। कुछ मटकियों में उसने पानी भर रखा था और वहीं लेटे-लेटे हरि-भजन गा रहा था।
राजा वहाँ आया, भगवान भोले बाबा के दर्शन किए और कुम्हार के पास जाकर बैठ गया। कुम्हार ने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया। राजा कुम्हार से कुछ प्रभावित हुआ और उसने सोचा कि यह इतनी-सी मटकियाँ बेचकर क्या कमाता होगा?
राजा ने पूछा, “क्यों भाई प्रजापति जी, क्या मेरे साथ नगर चलोगे?”
प्रजापति ने कहा, “नगर जाकर क्या करूँगा, राजाजी?”
राजा बोला, “वहाँ चलकर खूब मटकियाँ बनाना।”
प्रजापति ने पूछा, “फिर उन मटकियों का क्या करूँगा?”
राजा ने कहा, “अरे क्या करोगे? उन्हें बेचना, खूब पैसा आएगा तुम्हारे पास।”
प्रजापति ने फिर पूछा, “फिर उस पैसे का क्या करूँगा?”
राजा बोला, “अरे पैसे का क्या करोगे? पैसा ही सब कुछ है।”
प्रजापति ने मुस्कराकर कहा, “अच्छा राजन, अब आप ही बताइए कि उस पैसे से मैं क्या करूँगा?”
राजा बोला, “फिर आराम से भगवान का भजन करना और आनन्द में रहना।”
प्रजापति ने विनम्रता से कहा,
“क्षमा कीजिए राजन! पर आप मुझे यह बताइए कि अभी मैं क्या कर रहा हूँ? और हाँ, पूरी ईमानदारी से बताइए।”
राजा कुछ देर सोच में पड़ गया। मानो इस प्रश्न ने उसे झकझोर दिया हो।
राजा बोला, “हाँ प्रजापति जी, आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हैं और जहाँ तक मुझे दिखाई दे रहा है, आप पूरे आनन्द में हैं।”
प्रजापति ने कहा,
“हाँ राजन! यही तो मैं आपसे कह रहा हूँ कि आनन्द पैसे से प्राप्त नहीं किया जा सकता।”
राजा बोला,
“हे प्रजापति जी, कृपा करके यह बताइए कि आनंद की प्राप्ति कैसे होगी?”
प्रजापति ने कहा,
“ध्यान से सुनिए और इस पर गहरा मंथन कीजिए, राजन! अपने हाथों को उल्टा कर लीजिए।”
राजा ने पूछा, “वह कैसे?”
प्रजापति ने कहा,
“हे राजन! माँगो मत, देना सीखो। यदि आपने देना सीख लिया, तो समझ लीजिए कि आपने आनन्द की राह पर कदम रख दिया। स्वार्थ को त्यागो और परमार्थ को चुनो। अधिकांश लोगों के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है कि जो कुछ उनके पास है, वे उसमें सुखी नहीं हैं और जो नहीं है, उसे पाने के चक्कर में दुःखी रहते हैं। जो है, उसमें खुश रहना सीख लो-दुःख अपने आप दूर हो जाएँगे। जो नहीं है, उसके पीछे क्यों दुःखी होते हो?”
