
■ सूर्यकांत उपाध्याय
कई स्थानों पर एक ऐसी मूर्ति दिखाई देती है, जिसमें एक व्यक्ति का पैर शिवलिंग के ऊपर रखा हुआ होता है और वह किसी छड़ी जैसी वस्तु से अपनी आंख निकालने की कोशिश करता दिखाई देता है। इस मूर्ति को लेकर अनेक लोगों में तरह-तरह की भ्रांतियां हैं। आइए, इस कथा को सही रूप में समझते हैं।
यह कहानी संत कनप्पा की है। कनप्पा उन 63 नयनार संतों में गिने जाते हैं, जो भगवान शिव के महान उपासक थे। ये संत लगभग तीसरी से आठवीं शताब्दी के बीच हुए थे। जिस प्रकार नयनार संत शिवभक्त थे, उसी प्रकार आलवार संत भगवान विष्णु के उपासक माने जाते हैं। कनप्पा पहले पेशे से शिकारी थे, लेकिन बाद में महान संत बन गए। उनके भक्त मानते हैं कि पिछले जन्म में वे पांडवों में से एक अर्जुन थे। कनप्पा नयनार के कई नाम प्रचलित हैं-थिन्नन, थिनप्पन, धीरा, कन्यन और कन्नन आदि। उनके माता-पिता ने उनका नाम थिन्ना रखा था। उनका जन्म आंध्र प्रदेश के राजमपेट क्षेत्र में हुआ था।
कनप्पा भगवान शिव के श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर में स्थित वायु लिंग की पूजा करते थे। कहा जाता है कि शिकार के दौरान ही उन्हें यह मंदिर मिला था। लेकिन उन्हें पूजा-पाठ के नियमों और विधि-विधान का ज्ञान नहीं था। उनकी भक्ति सरल और निष्कपट थी। वे पास की स्वर्णमुखी नदी से मुंह में पानी भरकर लाते और उससे शिवलिंग का अभिषेक करते थे। जो भी शिकार उन्हें मिलता, उसका एक हिस्सा वे भगवान शिव को अर्पित कर देते थे।
कहते हैं कि एक दिन भगवान शिव ने अपने भक्त की परीक्षा लेने का निश्चय किया। मंदिर में अचानक भूकंप जैसे झटके आने लगे और ऐसा लगा मानो मंदिर की छत गिरने वाली है। डरकर सभी लोग वहां से भाग गए, लेकिन कनप्पा वहीं डटे रहे। उन्होंने अपने शरीर से शिवलिंग को ढक लिया ताकि गिरने वाले पत्थर शिवलिंग पर न गिरें।
जब झटके कुछ थमे, तो कनप्पा ने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से रक्त और आंसू निकल रहे हैं। उन्हें लगा कि भगवान शिव की आंख घायल हो गई है। तुरंत उन्होंने अपनी एक आंख बाण से निकालकर शिवलिंग की आंख पर लगा दी, जिससे रक्त बहना बंद हो गया। लेकिन थोड़ी देर बाद शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त और आंसू निकलने लगे।
अब कनप्पा ने अपनी दूसरी आंख निकालने का निश्चय किया। तभी उन्हें विचार आया कि यदि दोनों आंखें निकाल दीं, तो वे अंधे हो जाएंगे और शिवलिंग पर आंख लगाने की जगह कैसे पहचान पाएंगे। तब उन्होंने एक उपाय किया। उन्होंने अपना पैर उठाकर उसका अंगूठा शिवलिंग की आंख के पास रख दिया, ताकि अंधा होने के बाद भी वह सही स्थान पहचान सकें।
जैसे ही वे अपनी दूसरी आंख निकालने वाले थे, उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने अपने इस निष्कपट भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी दोनों आंखें पुनः ठीक कर दीं। तभी से थिन्ना को कनप्पा नाम से जाना जाने लगा।
यही वह घटना है, जिसे दर्शाने के लिए संत कनप्पा की वह मूर्ति बनाई जाती है, जिसमें उनका पैर शिवलिंग पर दिखाई देता है। इसका उद्देश्य यह बताना है कि सच्ची भक्ति नियमों से नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम और समर्पण से होती है।
