■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक पति-पत्नी में तकरार हो गई।
पति कह रहा था, “मैं इस शहर का नवाब हूँ, लोग इसलिए मेरी इज्जत करते हैं। तुम्हारी इज्जत भी मेरी वजह से है।”
पत्नी बोली, “नहीं, आपकी इज्जत मेरी वजह से है। मैं चाहूँ तो आपकी इज्जत एक मिनट में बिगाड़ भी सकती हूँ और बना भी सकती हूँ।”
नवाब को तैश आ गया। वह बोला, “ठीक है, दिखाओ मेरी इज्जत खराब करके!”
बात आई-गई हो गई। शाम को नवाब के घर दोस्तों की महफ़िल जमी। हँसी-मजाक चल रहा था कि अचानक नवाब को अपने बेटे के रोने की आवाज आई। वह ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था और नवाब की पत्नी उसे बुरी तरह डाँट रही थी।
नवाब ने आवाज लगाकर पूछा, “क्या हुआ बेगम, क्यों डाँट रही हो?”
बेगम ने अंदर से कहा, “देखिए न, आपका बेटा खिचड़ी माँग रहा है, जबकि उसका पेट पहले ही भर चुका है।”
नवाब ने कहा, “तो दे दो थोड़ी-सी और।”
बेगम बोली, “घर में और भी तो लोग हैं, सारी इसी को कैसे दे दूँ?”
पूरी महफ़िल में सन्नाटा छा गया। लोग कानाफूसी करने लगे, कैसा नवाब है! जरा-सी खिचड़ी के लिए इसके घर में झगड़ा हो रहा है।
नवाब की पगड़ी उछल गई। सभी लोग चुपचाप उठकर चले गए।
नवाब अपनी बेगम के पास आया और बोला, “मैं मान गया। आज तुमने मेरी इज्जत उतार दी। लोग कैसी-कैसी बातें कर रहे थे। अब तुम यही इज्जत वापस लाकर दिखाओ।”
बेगम बोली, “इसमें कौन-सी बड़ी बात है! आज जो लोग महफ़िल में थे, आप किसी बहाने से उन्हें फिर निमंत्रण दीजिए।”
नवाब ने फिर से सबको बैठक और मौज-मस्ती के बहाने बुलाया। सभी मित्र बैठे थे, हँसी-मजाक चल रहा था कि फिर नवाब के बेटे के रोने की आवाज आई।
नवाब ने आवाज देकर पूछा, “बेगम, क्या हुआ? हमारा बेटा क्यों रो रहा है?”
बेगम ने कहा, “फिर वही खिचड़ी खाने की जिद कर रहा है।”
लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, अरे, एक मामूली खिचड़ी के लिए इस नवाब के घर रोज़ झगड़ा होता है!
नवाब मुस्कुराकर बोला, “अच्छा बेगम, तुम एक काम करो। खिचड़ी यहाँ ले आओ। हम अपने हाथों से बेटे को खिलाएँगे। शायद वह मान जाए। और मेहमानों को भी खिचड़ी खिलाओ।”
बेगम बोली, “जी नवाब साहब।”
कुछ ही देर में बेगम बैठक में आ गई। पीछे नौकर सिर पर खाने का सामान लेकर आ रहा था। हाँडी नीचे रखी गई और मेहमानों को भी परोसा जाने लगा।
सभी दोस्त हैरान रह गए। जो परोसा जा रहा था, वह साधारण चावल की खिचड़ी नहीं थी। उसमें खजूर, पिस्ता, काजू, बादाम, किशमिश और तरह-तरह के मेवे डालकर बनाया गया अत्यंत स्वादिष्ट व्यंजन था।
लोग मन-ही-मन सोचने लगे, अगर यह खिचड़ी है तो नवाब के घर मावा-मिठाई कैसी होती होगी!
नवाब की इज्जत को चार-चाँद लग गए। लोग उसकी रईसी की चर्चा करने लगे।
नवाब ने बेगम के सामने हाथ जोड़कर कहा, “मैं मान गया कि घर की औरत इज्जत बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है। जिस व्यक्ति को घर में इज्जत नहीं मिलती, उसे दुनिया में कहीं भी इज्जत नहीं मिलती।”
