● धर्मराज को मिले श्राप की पौराणिक रोचक कथा
■ सूर्यकांत उपाध्याय

विदुर महाभारत के अत्यंत बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ पात्रों में से एक माने जाते हैं। वे हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री थे और कौरवों तथा पांडवों के काका भी थे। धृतराष्ट्र और पाण्डु उनके भाई थे। विदुर का जन्म एक दासी के गर्भ से हुआ था, फिर भी उनकी विद्वत्ता, नीति और धर्मपरायणता के कारण उन्हें अत्यंत सम्मान प्राप्त था। पौराणिक मान्यता के अनुसार विदुर, धर्मराज के अवतार थे। उनके मानव रूप में जन्म लेने के पीछे एक रोचक कथा बताई जाती है।
कथा के अनुसार माण्डव्य ऋषि खांडव वन में अपने आश्रम के बाहर एक वृक्ष के नीचे तपस्या किया करते थे। एक दिन कुछ चोर चोरी का सामान लेकर वहां पहुंचे और स्वयं को व्यापारी बताकर बोले कि लुटेरे उनका पीछा कर रहे हैं। ऋषि ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया और उनका सामान आश्रम में रखवा दिया। थोड़ी देर बाद सैनिक वहां पहुंचे और तलाशी लेने पर उन्हें वही चोरी का सामान मिल गया। संदेह के आधार पर सैनिकों ने माण्डव्य ऋषि को पकड़ लिया और राजा के सामने प्रस्तुत किया।
राजा ने बिना पूरी बात सुने ही उन्हें शूली पर चढ़ाने का आदेश दे दिया। जब ऋषि को शूली पर चढ़ाया गया तो उन्होंने अपने तपोबल से स्वयं की रक्षा कर ली। यह देखकर राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगी। इसके बाद माण्डव्य ऋषि धर्मराज के पास गए और पूछा कि उन्हें यह दंड किस कर्म के कारण मिला।
धर्मराज ने बताया कि बाल्यावस्था में उन्होंने एक पतंगे की पूंछ में कांटा चुभाया था, उसी कर्म का यह परिणाम है। यह सुनकर माण्डव्य ऋषि क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा कि बारह वर्ष तक का बालक अपने कर्मों के लिए पूर्णतः उत्तरदायी नहीं होता। न्याय के आसन पर बैठकर ऐसा निर्णय देना अन्याय है।
क्रोध में आकर उन्होंने धर्मराज को श्राप दिया कि उन्हें मानव योनि में जन्म लेना पड़ेगा। इसी श्राप के कारण धर्मराज ने विदुर के रूप में धरती पर जन्म लिया और जीवन भर धर्म और न्याय की रक्षा का मार्ग दिखाते रहे।
