■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक शहर में एक परिश्रमी, ईमानदार और सदाचारी लड़का रहता था। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र और रिश्तेदार सभी उसे बहुत प्यार करते थे। सबकी सहायता के लिए तत्पर रहने के कारण पड़ोसियों से लेकर सहकर्मियों तक सभी उसका सम्मान करते थे। सब कुछ अच्छा था, किंतु जीवन में जिस सफलता का सपना वह देखा करता था, वह उससे कोसों दूर थी।
वह दिन-रात जी-जान से मेहनत करता, किंतु उसके हाथ बार-बार असफलता ही लगती। इसी तरह संघर्ष करते-करते उसका पूरा जीवन बीत गया और अंततः वह जीवनचक्र से निकलकर कालचक्र में समा गया।
चूँकि उसने जीवन में सद्कर्म किए थे, इसलिए उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। देवदूत उसे लेकर स्वर्ग पहुँचे। स्वर्गलोक का अलौकिक सौंदर्य देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गया और देवदूत से बोला, “यह कौन-सा स्थान है?”
देवदूत ने उत्तर दिया, “यह स्वर्गलोक है। तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें यहाँ स्थान मिला है। अब से तुम यहीं रहोगे।”
यह सुनकर वह प्रसन्न हो गया। देवदूत ने उसे वह घर दिखाया, जहाँ उसके रहने की व्यवस्था की गई थी। वह अत्यंत आलीशान घर था। इतना भव्य घर उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था।
देवदूत उसे घर के भीतर ले गया और एक-एक करके सभी कक्ष दिखाने लगा। अंत में वह उसे एक ऐसे कक्ष के सामने ले गया, जिस पर “स्वप्न कक्ष” लिखा हुआ था।
जब वे उस कक्ष के भीतर पहुँचे, तो लड़का यह देखकर दंग रह गया कि वहाँ अनेक वस्तुओं के छोटे-छोटे प्रतिरूप रखे हुए थे। ये वही वस्तुएँ थीं, जिन्हें पाने के लिए उसने जीवन भर मेहनत की थी, किंतु हासिल नहीं कर पाया था-
आलीशान घर, कार, उच्च पद और ऐसी ही अनेक चीजें।
उसने जिज्ञासावश पूछा, “ये सब यहाँ इस रूप में क्यों रखे हैं?”
देवदूत ने कहा, “मनुष्य जीवन में अनेक सपने देखता है। ईश्वर और ब्रह्माण्ड उन्हें पूरा करने की तैयारी भी करते हैं, किंतु कई बार असफलताओं से निराश होकर मनुष्य उस क्षण प्रयास छोड़ देता है, जब उसके सपने पूरे होने वाले होते हैं। उसके वही अधूरे सपने यहाँ प्रतिरूप के रूप में रखे रहते हैं।”
लड़के को अपनी भूल समझ आ गई, किंतु अब बहुत देर हो चुकी थी।
