■ सूर्यकांत उपाध्याय

भक्ति रस में डूबे गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य और रामभक्ति परंपरा के महान संत माने जाते हैं। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास का जन्म सावन शुक्ल सप्तमी, 30 जुलाई 1554 को उत्तर प्रदेश के राजापुर गाँव में हुआ था। जन्म के दूसरे ही दिन उनकी माता हुलसी का निधन हो गया। कहा जाता है कि जन्म के समय रोने के बजाय उनके मुख से “राम” नाम निकला, इसलिए उनका नाम रामबोला पड़ गया।
माता के निधन के बाद चुनिया नामक दासी ने पाँच वर्षों तक उनका पालन-पोषण किया। उसके बाद उसके निधन से रामबोला अनाथ हो गए। उनकी स्थिति देखकर गुरु नरहर्यानंद उन्हें अयोध्या ले आए और उनका नाम तुलसीदास रख दिया।
तुलसीदास का विवाह भारद्वाज गोत्र के दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ। वे अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करते थे और उनके प्रति अत्यधिक आसक्त थे। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, विवाह के बाद रत्नावली मायके चली गईं। पत्नी-वियोग सहन न कर पाने पर एक रात तुलसीदास उनसे मिलने निकल पड़े। घोर वर्षा और अंधेरी रात में उन्होंने उफनती नदी को एक शव के सहारे पार किया और सर्प को रस्सी समझकर घर की दीवार पर चढ़ गए।
रत्नावली ने यह देखकर उन्हें लज्जित करते हुए कहा
“अस्थि-चर्ममय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीति।”
अर्थात यदि इतना प्रेम भगवान राम से होता, तो जीवन के भय समाप्त हो जाते। पत्नी के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी। वे सांसारिक मोह त्यागकर रामभक्ति में लीन हो गए।
इसके बाद उन्होंने रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, कवितावली और दोहावली जैसे अमर ग्रंथों की रचना की। सन 1623 में वाराणसी के अस्सी घाट पर उनका देहावसान हुआ। तुलसीदास का जीवन इस सत्य को दर्शाता है कि कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक प्रेरणा एक साधारण घटना से भी मिल जाती है।
