
■ सूर्यकांत उपाध्याय
एक बार की बात है। एक माई भगवान से बहुत नाराज थी। कारण यह था कि उसके पुत्र का विवाह हुए दस वर्ष बीत चुके थे, पर अब तक उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी।
दीपावली आने वाली थी। नगर में सभी अपने-अपने घरों की रंगाई-पुताई में लगे थे। वह माई भी क्रोध से भरी हुई, भगवान को भला-बुरा कहती हुई, एक कपड़े का पोता बनाकर अपने आँगन की दीवार पर रंग पोत रही थी। संयोग से संत माधवदास उधर से गुजर रहे थे। उस दरवाजे के पास आकर वे संत भिक्षा माँगने लगे।
क्रोध बुद्धि और विवेक का दीपक बुझा देता है। उस माई ने आव देखा न ताव, वही कपड़े का पोता उठाकर संत की छाती पर दे मारा। वह पोता संत की छाती से टकराकर भूमि पर गिर पड़ा। संत माधवदास ने उस पोते को उठाकर माथे से लगाया, अपने झोले में रखा और अपने स्थान पर लौट आए।
संत ने उस पोते को भली प्रकार धोकर स्वच्छ किया, सुखाया और उसके धागे-धागे अलग कर उन धागों की बत्तियाँ बना लीं। प्रतिदिन वे उन्हीं बत्तियों से भगवान की पूजा करने लगे।
दैवयोग से दिन बीतते गए। एक-एक बत्ती भगवान के चरणों में अर्पित होती रही और दसवें महीने उस माई को सचमुच पोते की प्राप्ति हो गई।
अब आप सज्जन विचार करें कि उस माई ने तो अपमान सहित कपड़े का पोता ही दिया था, फिर भी संत की कृपा से उसे वास्तविक पोता मिल गया। यदि वह आदर-भाव से थोड़ी-सी सेवा कर देती, तो वे कृपालु संत कितनी अधिक कृपा करते!
सोचिए, जब वह रंग-पुता कपड़े का पोता संत का संग पाकर भगवान के दरबार तक पहुँच गया, तब यदि हम भी संत का संग कर लें, तो क्यों न हमारी पहुँच भी भगवान के दरबार तक हो जाए?
