■ सूर्यकांत उपाध्याय

शहर की पुरानी गलियों के बीचों-बीच एक दोमंज़िला घर था। कभी यह घर हँसी-मज़ाक, आवाज़ों और चहल-पहल से भरा रहता था। लेकिन अब उसी घर की पहली मंज़िल के आख़िरी कमरे में 82 साल की दादी रहती थीं। उनका दरवाज़ा हमेशा आधा खुला रहता, जैसे वे आज भी किसी का इंतज़ार करती हों, और कमरे में ऐसा सन्नाटा था, जो उम्र के साथ इंसान को चुपचाप घेर लेता है।
कभी यही दादी पूरे घर की धड़कन थीं। सुबह चार बजे उठना, पूजा की घंटी बजाना, रसोई की खनक, बच्चों की हँसी, बहुओं की बातें हर जगह उनकी मौजूदगी थी। उनकी कहानियों में पूरा मोहल्ला बसता था और उनकी रसोई में प्यार पकता था। लेकिन वक़्त बदलता है, और कुछ बदलाव ऐसे चुपचाप आते हैं कि इंसान कब अकेला हो गया, उसे पता भी नहीं चलता।
धीरे-धीरे घर में सब व्यस्त हो गए। बेटे नौकरी में, बहुएँ मीटिंग्स और मोबाइल में, और पोते-पोतियाँ दादी की कहानियों से ज़्यादा मोबाइल गेम्स में दिलचस्पी लेने लगे। दादी वही थीं, घर वही था, पर रिश्ते बदलने लगे।
अब उनकी दुनिया बस उनके कमरे में सिमट गई थी, एक चारपाई, पुरानी अलमारी, तस्वीरों वाला एक एलबम और एक खिड़की, जो बाहर की दुनिया दिखाती थी। दादी के पास जीवन का लंबा अनुभव था, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं था।
बहू रोज़ खाना कमरे में रख देती, “दादी, खा लीजिए, मुझे जल्दी है।”
दादी बिना कुछ बोले थाली को देखती रह जातीं।
कभी पोता जल्दी में आता
“दादी, अभी नहीं, मेरा गेम चल रहा है।”
और कभी पूरा दिन बीत जाता, लेकिन किसी ने दादी से यह तक नहीं पूछा कि वे कैसी हैं।
दादी अक्सर सोचतीं कि मौत अचानक नहीं आती, वह धीरे-धीरे पास आती है। पहले इंसान को रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है। उनके कमरे में अब घड़ी की टिक-टिक गूँजती रहती, और यह आवाज़ भी उन्हें याद दिलाती कि समय ही नहीं, लोग भी उनसे दूर हो गए हैं।
एक शाम दादी चारपाई पर बैठकर ढलते सूरज को देख रही थीं। बाहर रोशनी कम हो रही थी और उनके दिल में भी उम्मीद का उजाला। उन्होंने धीरे से पुकारा, “कोई है?” लेकिन बाहर टीवी की आवाज़ थी, और दादी तक कोई जवाब नहीं पहुँचा।
अगले दिन उनकी पोती कमरे में आई, हाथ में मोबाइल लिए हुए।
“दादी, आपने सुबह फोन किया था? मैं क्लास में थी।”
दादी ने मुस्कुराकर कहा, “बस तुमसे थोड़ी बात करनी थी।”
पोती बोली, “अच्छा, अभी क्लास है, बाद में बात करती हूँ,” और चली गई।
दादी ने कुछ नहीं कहा, पर अंदर कुछ टूट गया।
दिन बीतते गए। उनकी सहेलियाँ चली गईं, रिश्तेदार कम होते गए, और उनकी दुनिया दवाइयों और यादों में सिमट गई। वे रात को एलबम खोलकर तस्वीरों से बातें करतीं, क्योंकि तस्वीरें उन्हें कभी टालती नहीं थीं।
एक सर्द रात, दादी की तबीयत थोड़ी बिगड़ गई। हड्डियाँ दर्द कर रही थीं और आवाज़ भी धीमी पड़ गई थी। उन्होंने पानी के लिए पुकारा, “कोई पानी दे दो…” लेकिन कोई नहीं आया। सब अपने-अपने कमरों में थे, टीवी, मोबाइल, मीटिंग, काम… पर दादी का कमरा पहले से भी ज़्यादा अकेला हो गया था।
उन्हें महसूस हुआ कि अकेलापन शरीर को नहीं, आत्मा को मारता है। और जब आत्मा थक जाती है, शरीर खुद ही हार मान लेता है।
सुबह बहू ने कमरे का दरवाज़ा खोला। दादी अपने तकिए के सहारे बिल्कुल शांत लेटी थीं। चेहरे पर गहरी शांति थी, लेकिन आँखों में हल्की नमी जैसे वे किसी का इंतज़ार करते-करते सो गई हों।
उस दिन पूरे घर में रोना-धोना मच गया। सबको लगा दादी आज चली गईं। लेकिन सच यह था कि दादी शायद उसी दिन चली गई थीं, जब घरवालों ने उनसे बातें करना कम कर दिया था।
82 साल की दादी का सबसे बड़ा दर्द यह नहीं था कि उनका शरीर कमजोर हो रहा था, बल्कि यह था कि रिश्तों ने उनका साथ छोड़ दिया था। उनके पास जीवन था, पर अपनापन नहीं; साँसें थीं, पर सुनने वाला कोई नहीं।
आज जो बुज़ुर्ग हमारे घर में हैं, वही कल हमारा भविष्य हैं। उन्हें अनदेखा मत कीजिए, वरना कल हमारी आवाज़ भी इसी सन्नाटे में खो जाएगी।
