■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बिल्ली बड़ी धार्मिक मानी जाती थी। दिन-रात हाथ में माला लिए बैठी रहती, दिन में शाकाहारी बनती और रात में चूहे मार आती। उसका तर्क था कि वह पड़ोसियों को चूहों से बचाने के लिए यह “पुण्य” कर रही है। अपने घर में वह कभी चूहे नहीं मारती, ताकि उसकी धार्मिक छवि पर दाग न लगे। लोग उसकी भक्ति और सादगी से इतने प्रभावित थे कि झुक-झुककर नमस्कार करते थे।
एक दिन घर में तोता लाया गया। तोते के गीत सुनकर बिल्ली को लगा कि यह अधार्मिक और कामुक है। उसने अपने मन को समझाया कि इस तोते को मारना उसके हित में है, ताकि वह पाप से मुक्त हो सके। रात में उसने तोते को मारकर खा लिया। सुबह पिटाई हुई, तो उसे दुख तोते की हत्या का नहीं, बल्कि कमरे में फैले पंख और खून के दागों का हुआ।
दूसरी बार उसने बिना कोई निशान छोड़े तोते को खा लिया, लेकिन फिर भी पिटाई हुई। तब उसे समझ आया कि लोग तोते को मारने के ही विरोधी हैं। तीसरी बार उसने तय किया कि अब तोते को नहीं मारेगी। फिर भी उपदेश देने के बहाने वह उसके पास पहुँची और उसे डराने लगी। भय से काँपते तोते को उसने इतना झकझोरा कि वह मर गया। तब बिल्ली ने सोचा, “मरे हुए को खाने में क्या हर्ज है!” और उसे खा गई।
यह प्रसंग बताता है कि ढोंगी लोग अपने स्वार्थ और हिंसा को भी धर्म का नाम देकर उचित ठहराने की कोशिश करते हैं।
