■ सूर्यकांत उपाध्याय

अर्जुन ने स्वयं को पूर्णतः श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था। वह अर्जुन होकर भी अपने लिए नहीं जीता था, बल्कि श्रीकृष्ण के सेवक के रूप में जीवन बिताता था। सेवक की चिंता स्वामी की चिंता बन जाती है। यही कारण था कि जब अर्जुन के प्राण संकट में पड़े, तो श्रीकृष्ण दौड़े चले आए।
अश्वमेध यज्ञ के दौरान अर्जुन के पुत्र बब्रुवाहन ने यज्ञ का अश्व पकड़ लिया। उसकी माता चित्रांगदा ने उसे अर्जुन को परास्त करने का संकल्प दिलाया था, क्योंकि विवाह के बाद अर्जुन कभी लौटकर नहीं आए थे। हालांकि चित्रांगदा ने यह नहीं बताया कि अर्जुन ही उसके पिता हैं। बब्रुवाहन ने शस्त्रविद्या सीखी और कामाख्या देवी से दिव्य बाण प्राप्त किया।
युद्ध में बब्रुवाहन ने भीम को मूर्छित कर दिया। फिर अर्जुन और बब्रुवाहन के बीच भयंकर संग्राम हुआ। अंततः बब्रुवाहन ने दिव्य बाण चलाकर अर्जुन का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह समाचार मिलते ही श्रीकृष्ण द्वारिका से तुरंत निकल पड़े। उन्होंने बलराम से कहा कि यदि देर हो गई तो अनर्थ हो जाएगा।
कुंती और पांडव विलाप करने लगे। तभी मां गंगा प्रकट हुईं। उन्होंने कहा कि अर्जुन को उसके कर्मों का फल मिला है, क्योंकि उसने शिखंडी की आड़ लेकर भीष्म पितामह का वध किया था। गंगा ने बताया कि बब्रुवाहन को मिला दिव्य बाण भी उसी की प्रेरणा से प्राप्त हुआ था। वह इसे अपने पुत्र भीष्म के प्रतिशोध की पूर्ति मान रही थीं।
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने गंगा से कहा कि मां कभी दूसरी मां से प्रतिशोध नहीं ले सकती। उन्होंने समझाया कि भीष्म का वध स्वयं उनकी इच्छा और मार्गदर्शन से हुआ था, जबकि अर्जुन ने बब्रुवाहन पर प्रहार तक नहीं किया था। श्रीकृष्ण के तर्क सुनकर गंगा का हृदय बदल गया और उन्होंने अर्जुन को पुनर्जीवित करने का उपाय बता दिया।
जिसने अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को सौंप दिया हो, उसकी रक्षा के लिए भगवान बिना बुलाए भी चले आते हैं। भगवान और भक्त का संबंध ऐसा ही होता है। अर्जुन और श्रीकृष्ण वास्तव में नर और नारायण हैं।
