■ सूर्यकांत उपाध्याय

पंडितजी अपने आरम्भिक दिनों में अत्यंत गरीब थे। दो जून की रोटी जुटाना भी उनके लिए कठिन था। उन्हीं दिनों घर में ऐसी आवश्यकता आ पड़ी, जिसे टालना संभव नहीं था। मजबूर होकर उन्हें एक महाजन से सूद पर दो सौ रुपए उधार लेने पड़े।
समय बीतता गया, लेकिन पंडितजी चाहकर भी कर्ज नहीं चुका सके। सूद बढ़ता गया। एक दिन महाजन उनके घर आ पहुँचा और पैसे लौटाने की जिद करने लगा। पंडितजी उसे टालना चाहते थे, मगर वह मानने को तैयार नहीं था।
महाजन ने कठोर स्वर में कहा, “पंडितजी, सब्र की भी सीमा होती है। अब सूद और मूल मिलाकर चार सौ रुपए हो गए हैं। पैसे लिए बिना मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।”
पंडितजी परेशान हो उठे। कुछ सोचकर बोले, “मुझे एक चिट्ठी लिख लेने दीजिए, फिर सूद-मूल की बात करेंगे।”
उन्होंने एक कागज पर कुछ लिखा, उसे मोड़कर धोती में रख लिया और बोले, “सेठजी, जब आप मान ही नहीं रहे, तो अब मैं अपनी इहलीला समाप्त कर रहा हूँ। इस चिट्ठी में मैंने महाराज को लिख दिया है कि मैंने आपसे दो सौ रुपए उधार लिए थे। अब आप सूद समेत चार सौ रुपए मांग रहे हैं और मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए अपमान सहने से अच्छा मैं फाँसी लगाना उचित समझता हूँ।”
इतना कहकर पंडितजी ने धोती का फंदा बनाकर छत की बल्ली में बाँधना शुरू कर दिया। यह देखकर महाजन घबरा गया। जब पंडितजी ने फंदा गले में डालना चाहा, तो वह उनके पैरों में गिर पड़ा और बोला, “महाराज, ऐसा मत कीजिए। ब्रह्महत्या का पाप मुझ पर लगेगा। मैं सारा सूद छोड़ देता हूँ। आप केवल दो सौ रुपए लौटा दीजिए।”
पंडितजी बोले, “मेरे पास एक धेला भी नहीं है। ऐसी जिंदगी से तंग आ चुका हूँ।”
महाजन डर गया। उसने विनती करते हुए कहा, “दो दिन बाद मेरे बेटे का विवाह है। पैसे की जरूरत उसी कारण थी। अच्छा, मैं मूल में से भी सौ रुपए छोड़ देता हूँ। बस बाकी सौ रुपए दे दीजिए।”
तब पंडितजी मुस्कराए और बोले, “ठीक है। अब आपके सौ रुपए बाकी हैं। परसों आपके बेटे का विवाह है और मैं पंडित हूँ। विवाह कराने के एकावन रुपए, तिलक के इक्कीस, नवग्रह शांति के इक्कीस और गाँठ बाँधने के इक्कीस- कुल एक सौ चौदह रुपए बनते हैं। मान लीजिए आपने मुझे सौ रुपए पेशगी दे दिए। विवाह के बाद केवल चौदह रुपए और दे दीजिएगा। अब हमारा हिसाब बराबर हुआ।”
बेचारा महाजन चुपचाप वहाँ से चला गया और पंडितजी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
