■ सूर्यकांत उपाध्याय

कुंतालपुर का राजा बड़ा ही न्यायप्रिय था। वह अपनी प्रजा के दुख-दर्द में सदैव साथ खड़ा रहता था। प्रजा भी उसका बहुत आदर करती थी। एक दिन राजा गुप्त वेश में अपने राज्य का भ्रमण करने निकला। रास्ते में उसने देखा कि एक वृद्ध एक छोटा-सा पौधा रोप रहा है।
राजा कौतूहलवश उसके पास गया और बोला, ‘आप किस चीज़ का पौधा लगा रहे हैं?’
वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा, ‘आम का।’
राजा ने मन ही मन हिसाब लगाया कि उसके बड़े होने और उस पर फल आने में कितना समय लगेगा। फिर उसने अचरज से वृद्ध की ओर देखा और कहा, ‘सुनिए दादा, इस पौधे के बड़े होने और उस पर फल आने में कई वर्ष लग जाएंगे। तब तक क्या आप जीवित रहेंगे?’
वृद्ध ने राजा की ओर देखा। राजा की आँखों में मायूसी थी। उसे लग रहा था कि वृद्ध ऐसा काम कर रहा है, जिसका फल उसे स्वयं नहीं मिलेगा।
यह देखकर वृद्ध ने कहा, ‘आप सोच रहे होंगे कि मैं पागलपन का काम कर रहा हूँ। जिस चीज़ से आदमी को स्वयं फायदा न पहुँचे, उस पर मेहनत करना व्यर्थ है। लेकिन यह भी तो सोचिए कि इस बूढ़े ने दूसरों की मेहनत का कितना लाभ उठाया है। दूसरों के लगाए पेड़ों के कितने फल मैंने अपनी जिंदगी में खाए हैं। क्या उस कर्ज को उतारने के लिए मुझे कुछ नहीं करना चाहिए?
क्या मुझे इस भावना से पेड़ नहीं लगाने चाहिए कि उनके फल दूसरे लोग खा सकें? जो केवल अपने लाभ के लिए काम करता है, वह स्वार्थी वृत्ति का मनुष्य होता है।’
वृद्ध की यह बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। आज उसे भी जीवन की एक बड़ी सीख मिल गई थी।
