▪️सूर्यकांत उपाध्याय

भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार और धर्म का रक्षक माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें एक महान तपस्विनी ऋषि-पत्नी पर सुदर्शन चक्र चलाना पड़ा? यह प्रसंग जितना आश्चर्यजनक है, उतना ही धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझाने वाला भी है।
देवासुर संग्राम में जब असुर पराजित होने लगे, तब वे महर्षि भृगु के आश्रम में पहुँचे। उस समय महर्षि भृगु तपस्या में लीन थे। उनकी धर्मपत्नी माता ख्याति, जिन्हें ‘काव्या’ भी कहा गया है, ने शरणागत असुरों को अभयदान दे दिया। उनके लिए शरणागत की रक्षा ही सर्वोच्च धर्म था।
माता ख्याति ने अपने तप और योगबल से इंद्र सहित समस्त देवताओं को स्तंभित कर दिया। देवता असहाय हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने पहले स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया, किंतु कोई समाधान नहीं निकला।
जब माता ख्याति के मंत्रबल से संपूर्ण देवशक्ति संकट में पड़ गई और सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब भगवान विष्णु ने धर्म और लोक-व्यवस्था की रक्षा के लिए विवश होकर सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। चक्र के प्रहार से माता ख्याति का मस्तक धड़ से अलग हो गया।
शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि भगवान विष्णु का यह कृत्य किसी व्यक्तिगत क्रोध, द्वेष या प्रतिशोध से प्रेरित नहीं था। यह निर्णय केवल धर्म, सृष्टि-संतुलन और लोककल्याण की रक्षा के लिए लिया गया था। बाद में महर्षि भृगु ने अपनी तपशक्ति से माता ख्याति को पुनः जीवित कर दिया।
- शिक्षा : भगवान का प्रत्येक कार्य लोककल्याण और धर्म की स्थापना के लिए होता है, न कि किसी के प्रति वैरभाव से।
- नोट: इस कथा के विभिन्न पुराणों में विवरण और पात्रों के वर्णन में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं। इसलिए इसे संबंधित शास्त्रीय संदर्भों के साथ ही समझना उचित माना जाता है। इस प्रसंग का उल्लेख निम्न ग्रंथों में मिलता है- श्रीमद्देवी भागवत पुराण (चतुर्थ स्कंध), मत्स्य पुराण और विष्णु पुराण।
